'गरीबों का दवाखाना' में इलाज करा चुके हैं 12 लाख लोग

ग्वालियर, 1 फरवरी (आईएएनएस)। आम आदमी की जरूरतों में से एक है इलाज, मगर आज उसकी यह जरूरत मुसीबत बन चुकी है, क्योंकि सरकारी कोशिशें इस दिशा में नाकाफी साबित हो रही हैं। इन हालातों में ग्वालियर का एक दवाखाना अन्य के लिए मिसाल बन गया है। यह लोगों की मदद से चल रहा है। इसका नाम गरीबों का दवाखाना है मगर इलाज के मामले में अमीर है।

ग्वालियर कभी औद्योगिक इकाइयों की स्थापना में मध्य प्रदेश का अव्वल जिला हुआ करता था। जहां जेसी मिल, ग्रेसिम का कारखाना था। इन दोनों कारखानों में हजारों लोग काम करते थे और उनके परिवार पलते थे, मगर वक्त की रफ्तार से पिछड़ जाने के कारण दोनों कारखाने बंद हो गए और बेरोजगारी ने यहां अपने पांव पसार लिए।

इन दोनों कारखाने के बंद होने के बाद पुराने ग्वालियर में बसे हजारों परिवार के सामने रोजी रोटी का तो संकट था ही, इलाज भी आसानी से सुलभ नहीं था। इसी के चलते 1994 में कुछ समाजसेवी लोगों ने लोकहितकारी ट्रस्ट बनाकर गरीबों का दवाखाना शुरू किया। आज इस ट्रस्ट के दो दवाखाने हैं। एक लोहामंडी में है तो दूसरा विनयनगर सेक्टर मे है।

ट्रस्ट के सचिव केशव पांडे ने आईएएनएस को बताया कि यह दोनों दवाखाना ट्रस्ट के सदस्यों और समाजसेवी लोगों की मदद से चलते हैं। सरकार से अब तक कोई मदद नहीं ली है। पिछले 16 साल में लगभग 12 लाख लोग यहां इलाज करा चुके हैं। यहां चिकित्सकों के साथ नर्सिंग स्टाफ मौजूद रहते हैं और विशेषज्ञ चिकित्सक भी अपनी विशेष सेवाएं देते है।

यहां पैथालॉजी एवं एक्स रे आदि की सुविधा उपलब्ध है। मरीजों से टोकन के तौर पर दो रुपए लिए जाते हैं, ताकि उनके अंदर सुविधा को फिजूल मानने का भान न हो और उन्हें दवाइयों से लेकर उपलब्ध सारी सुविधाएं नि:शुल्क दी जाती हैं।

पांडे बताते हैं कि शहर के 700 लोग ऐसे हैं कि जो इस दवाखाना को चलाने में मदद करते हैं। कोई अपने परिजनों की पुण्यतिथि पर तो कोई जन्मदिन पर 1500 रुपये की राशि देकर मदद करते हैं। औसतन 1500 रुपये एक दिन में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं पर खर्च होते हैं। हर रोज 250 से अधिक मरीज यहां इलाज कराने आते हैं।

इन दवाखानों को चलाने में शहर के लोग 25 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक की मदद करते हैं। मददगारों से सीधे संपर्क स्थापित कर उनके घर तक से राशि इकट्ठा करने की जिम्मेदारी शैलेश मिश्रा पर है।

इस दवाखाने मे पैथालॉजी डा. वी. एन. सचदेवा ने अपनी पत्नी की याद में बनवाई है तो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने एक्स रे मशीन और स्टेट बैंक ऑफ इंदौर ने एम्बुलेंस दी है। इसके अलावा एल. आई. सी. ने ऑटोमेटिक ब्लड एनालाइजर दिया है।

इन दवाखानों में मरीज को भर्ती करने की व्यवस्था नहीं है और गंभीर रोग से पीड़ित मरीज यहां आता है तो ट्रस्ट उसे मेडीकल कालेज ले जाने की व्यवस्था कर इलाज कराता है। उसके बाद उपचार के लिए जरूरी मदद करता है। पांडे बताते हैं कि भोपाल में मरीजों के उपचार में वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बसीम अख्तर उनकी मदद करते हैं।

ट्रस्ट से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सरकारी अस्पतालों को भी सामाजिक संस्थाओं को सौंप दिया जाए तो गरीब और जरूरतमंद का बेहतर इलाज हो सकेगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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