पद्मश्री ठुकरा चुके शास्त्री को मिल चुके हैं कई पुरस्कार
वर्ष 1987 में शास्त्री को 'राजेन्द्र शिखर सम्मान' से नवाजा गया था, तो वर्ष 1990 में दिल्ली मोहनलाल केडिया न्यास ने 'साधना सम्मान' से सम्मानित किया गया था। इसके बाद वर्ष 2001 में उन्हें 'भारत-भारती शिखर सम्मान' दिया गया। इसके ठीक दो वर्ष बाद 2003 में साहित्य में अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 'शिवपूजन सहाय सम्मान' से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त भी 30 से ज्यादा पुरस्कारों से शास्त्री को सम्मनित किया जा चुका है।
शास्त्री कथा-काव्य, वस्तुनिष्ठ काव्य, उपन्यास, कथा, और आलोचनात्मक लेखन के बेजोड़ उदहारण हैं। वह 'शिप्रा' और 'मेघगीत' जैसी काव्य कृतियों के रचयिता हैं तो 'कालिदास' और 'दो तिनकों का घोसला' जैसे उपन्यास के सृजनकर्ता भी हैं।
'अपर्णा' और 'बांसों का झुरमुट' जैसे कहानी संग्रह से उन्होंने आमजन की पीड़ा को अभिव्यक्ति दी तो ललित निबंधों में 'मन की बात' और 'जो ना बिक सकी' से अपनी अलग पहचान बनाई।
पद्मश्री मिलने की घोषणा के बाद शास्त्री ने कहा है कि उनकी अनुशंसा पर कई लोगों को यह सम्मान मिल चुका है। इसलिए यह सम्मान उनके लिए कोई मायने नहीं रखता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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