'नहीं बचेगा ईरानी गणराज्य'

तीस साल पहले ईरानी क्रांति के बाद वहां के पहले चुने गए राष्ट्रपति ने कहा है कि इस इस्लामी गणराज्य के बचने के आसार नहीं हैं.
अबुल हसन बनी सद्र 25 जनवरी, 1980 को राष्ट्रपति चुने गए थे लेकिन उसके कुछ ही महीनों बाद इरानी क्रांति की अगुवाई करनेवाले अयातुल्ला खुमैनी के प्रति वफ़ादार ईरानी संसद ने उन्हें हटा दिया था.
पहले ईरानी राष्ट्रपति के चुनाव की तीसवीं सालगिरह पर बनी सद्र ने बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में कहा है कि उन्हें नहीं लगता ईरानी सत्ता वर्तमान चुनौतियों के सामने ठहर पाएगी.
उनका कहना था कि ये स्पष्ट है कि पिछले साल हुए महमूद अहमदीनेजाद के चुनाव में धांधली हुई थी और ईरानी नेतृत्व की जो वैधता थी वो खत्म हो गई है.
बनी सद्र का कहना था, ईरानी सत्ता अपना जनाधार खो चुकी है, शासन करने की क्षमता खो चुकी है और अपने ही बनाए क़ानूनों का सम्मान नहीं कर पा रही. ईरानी समाज एक ऐसी सरकार देख रही है जो सत्ता में बने रहने के लिए खुद को बेच रही है.’’
बनी सद्र जब ईरानी क्रांति से जुड़े तो वो एक छात्र थे. कुछ ही समय में वो अयातुल्लाह खुमैनी के करीबी लोगों में गिने जाने लगे थे.
ये पूछे जाने पर कि क्या वो ईरान के विपक्षी नेताओं का समर्थन करते हैं, बनी सद्र ने कहा कि ज़रूरत इस बात की है कि आंदोलन लोगों का नेतृत्व करे उसके प्रतिनिधि नहीं.
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन को अमरीका और अन्य देशों की मदद की भी ज़रूरत है लेकिन तटस्थ भाव से.
उनका कहना था, आर्थिक प्रतिबंध या फ़ौजी हमले का रास्ता छोड़कर ज़रूरत है लोगों को अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने दिया जाए. राष्ट्र और सरकार के बीच का जो संघर्ष है उसमें ये देश तटस्थ रहें लेकिन जब मानवाधिकारों का हनन हो तो वो अवश्य आवाज़ उठाएं.’’
अबूल हसन बनी सद्र को केवल अठारह महीनों में राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ा था.
घरेलू और विदेश नीति को स्थापित करने की उनकी कोशिशों को ख़ामनेई के वफ़ादारों ने चलने नहीं दिया और उन्हें देश से पलायन कर फ्रांस जाना पड़ा.
निर्वासन के दौरान भी वो ईरानी नेतृत्व की आलोचना करते रहे हैं और अब उनका कहना है कि प्रदर्शनों को ज़्यादा दिन नहीं दबाया जा सकेगा क्योंकि लोगों का डर ख़त्म हो चुका है.












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