वोट देने की आयु को 18 साल तक घटाना (गणतंत्र दिवस पर विशेष-5)

नई दिल्ली, 21 जनवरी (आईएएनएस)। आईएएनएस की चुनिंदा भाषणों की श्रृंखला की पांचवीं कड़ी में आज पेश है राजीव गांधी का भाषण। इस भाषण में की गई घोषणा स्पष्ट रूप से भारतीय प्रजातंत्र के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि वोट देने की आयु घटाने से मतदाताओं की कुल संख्या तुरंत बढ़ गई। राजीव गांधी युवा थे और उनका व्यक्तित्व युवकों के लिए विशेष आकर्षण रखता था।

इस बदलाव ने भारी संख्या में युवाओं को प्रजातांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर दिया। यह आश्चर्य की बात थी कि इतना गहरा प्रभाव डालने वाले निर्णय ने कोई विवाद नहीं खड़ा किया, न उसने राजीव गांधी को बहुत साधुवाद दिलाया। पेश है राजीव गांधी का भाषण-

मैं शुरुआत में ही कह दूं कि यह सरकार जो कानून लेकर आयी है, वह एक महत्वाकांक्षी कानून है, जिसका उद्देश्य प्रजातंत्र की जड़ों को मजबूत बनाना है। हमारा भारतीय प्रजातंत्र कई मायनों में अनोखा है। यह एक अनोखा प्रयोग है, जिसमें पूरे विश्व को दिलचस्पी है। विभिन्न मूल के लोगों, विभिन्न भाषा-भाषियों, विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले, विभिन्न धर्मों को मानने वाले और विभिन्न जातियों से युक्त एक बहुरंगी समाज पहली बार एक प्रजातांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत लाया गया है। एक अर्थ में जगत के भीतर यह एक लघु जगत है और साथ ही विश्व के सामने एक जीता-जागता उदाहरण भी कि विविधता से पूर्ण हमारे जैसे समाज में भी प्रजातंत्र संभव है, जो भूमंडलीय स्तर पर लोगों के मिल-जुलकर रहने की दिशा में एक अंतरराष्ट्रीय प्रजातंत्र के लिए एक आदर्श बन सकता है।

इन 40 वर्षो में भारतीय प्रजातंत्र का प्रयोग अत्यधिक सफल रहा है- शायद किसी भी विकासशील देश से अधिक सफल। और इस प्रयोग की सफलता के लिए मैं भारत की जनता को धन्यवाद व बधाई देना चाहूंगा।

इन 40 वर्षों में हमने कई बातें सीखी हैं और कुछ कमजोर पक्षों की ओर भी हमारा ध्यान गया है। इन कमजोरियों को दूर किया जाना आवश्यक है। 40 वषों में पहली बार यह विधेयक चुनावी सुधारों से संबंधित मुद्दों पर विचार करता है। इस सरकार ने पहले दल-बदल विरोधी विधेयक लाकर चुनाव सुधारों की प्रक्रिया शुरू की। उसके बाद हमने कंपनी अधिनियम में संशोधन करके कंपनियों द्वारा दान दिए जाने का नियमन किया। उसके बाद धार्मिक संस्थाओं का दुरुपयोग रोकने के उद्देश्य से हम एक विधेयक लाए। उसी संसद में हम यह चौथा कदम उठा रहे हैं।

यह विधेयक कई क्षेत्रों को अपने दायरे में लेता है। मैं उन सभी का ब्योरेवार जिक्र नहीं करूंगा। विधि मंत्री और अन्य सदस्यों ने इन ब्योरों पर चर्चा की है। परंतु ये कुछ क्षेत्र हैं, जिन पर मैं संक्षेप में बात करूंगा। यह विधेयक जिन सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर विचार करता है, उनमें से एक है हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता बनाए रखना।

धर्मनिरपेक्षता क्यों महत्वपूर्ण है, इस पर एक मिनट की चर्चा उपयोगी होगी। हमारे लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ समझना महत्वपूर्ण है, क्योंकि हममें से कुछ लोग है, जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म को नष्ट करना चाहते हैं। हमारी धर्मनिरपेक्षता धर्म-विरोधी नहीं है, न वह धर्म को नष्ट करने के पक्ष में है। हमें इसे ठीक से समझ लेना चाहिए। मैं साफ तौर पर यह कहना चाहूंगा कि कोई भी व्यक्ति, जो यह समझता है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का विनाश है या यह कोई धर्म-विरोधी कार्य है, वह धर्मनिरपेक्षता शब्द के साथ अन्याय कर रहा है, वह हमारे राष्ट्र के साथ अन्याय कर रहा है और कुछ लोग, जो इसमें विश्वास रखते हैं उन्हें अपनी सोच बदल लेनी चाहिए, क्योंकि वह हमारे देश के लिए खतरनाक है।

धर्मनिरपेक्षता आवश्यक है, क्योंकि हमारे जैसे बहुलतावादी समाज में राजनीति और सरकार चलाने को धर्म से अलग रखना आवश्यक है। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम देश को विखंडित करने और राष्ट्र को नष्ट करने का भारी खतरा उठाते हैं। शायद इसका प्रभाव केवल राष्ट्र पर होने वाले प्रभाव से कहीं अधिक होगा। हम तो राष्ट्र को खो देंगे, दुनिया भी मानव समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयोग खो देगी। इस तरह इसमें निहित खतरे हमारे राष्ट्र पर आने वाले खतरों से कहीं अधिक हैं।

गांधीजी और पंडितजी ने हमें जिस मार्ग का पथिक बनाया और इंदिराजी ने हमें जिस मार्ग पर चलाया, उसके लक्ष्य हमारे देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है, और हमें अपनी दृष्टि को सीमाओं तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। हमारी दृष्टि उसके पार जानी चाहिए। इस तरह धर्मनिरपेक्षता एक संकेत शब्द है और यह आवश्यक है कि हमारे सारे क्रियात्मक क्षेत्रों में धर्मनिरपेक्षता का समावेश हो। चुनाव और चुनाव प्रक्रिया ऐसा ही एक अति महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

धार्मिक संस्थाओं के दुरुपयोग को रोकने वाला विधेयक लाकर हमने पहला कदम उठाया। इस विधेयक के जरिए राजनीतिक दलों को भारत के संविधान के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाकर हम उन्हें धर्मनिरपेक्षता के लक्ष्य की दिशा में धकेल रहे हैं। मेरे लिए यहां यह कहना महत्वपूर्ण है कि जब हम लोगों को धर्मनिरपेक्षता की ओर धकेलते हैं और मैं कह रहा हूँ, 'धकलते' हैं, बाध्य नहीं करते, क्योंकि जब हम उन्हें बाध्य करना शुरू करते हैं तो सुगमता नष्ट हो जाती है, लोग कठोर निर्णय लेते हैं। हमें उन्हें समझाकर मुख्यधारा में लाना चाहिए और हम वही करने का प्रयास कर रहे हैं। हम बहुत कठोर रवैया अपना सकते थे। मैंने सदन की कार्रवाई का अवलोकन किया है। कुछ सदस्य महसूस करते हैं कि बहुत कठोर उपाय किए गए हैं। मंत्रिमंडल ने इस पर विचार किया।

इस पर गहराई से विचार करने के बाद हमने महसूस किया कि इस दिशा में नरमाई से आगे बढ़ा जाए, क्योंकि यदि हमने सख्ती की तो एक ऐसी स्थिति आ सकती है कि हम अपनी आबादी के एक बड़े भाग को अलग-थलग कर दें और जान-बूझकर विघटनकारी प्रवृत्तियों को विकसित होने का अवसर दें। हमने लोगों को मुख्यधारा में लाने और उन्हें यह विश्वास दिलाने का यही सही रास्ता है, का रास्ता अपनाया है। हमारा विश्वास है कि राजनीतिक दलों को भारत के संविधान के प्रति उत्तरदायी बनाने से हम केवल हमारी चुनाव प्रक्रिया, हमारे प्रजातंत्र और हमारे राष्ट्र को मजबूत बना रहे हैं। कोई भी राजनीतिक दल, जो भारत के संविधान के अधीन नहीं चलना चाहता, वह एक राजनीतिक दल के रूप में स्वीकार किए जाने के योग्य नहीं है।

विपक्ष के एक सम्मानित सदस्य और हमारे पक्ष के एक सम्मानित सदस्य ने धार्मिक संस्थाओं के दुरुपयोग संबंधी विधेयक के सभी प्रावधानों को लागू करने के लिए संशोधन का सुझाव दिया है। हमारा विचार था कि इस आशय का प्रावधान पहले ही शामिल था; परंतु वह शायद कुछ नरम था, वह विधेयक के दायरे में था, परंतु पूरी तरह से नहीं। मैंने विधि मंत्री से एक सरकारी संशोधन लाने के लिए कहा है, क्योंकि इन दोनों प्रस्तावों की शब्दावली को लेकर कुछ तकनीकी समस्याएं हैं। हम संबंधित प्रावधान को शामिल करने के लिए एक सरकारी संशोधन लाएंगे और इसके लिए मैं दोनों सदनों के सदस्यों को धन्यवाद देना चाहूंगा।

विधेयक का एक और अति महत्वपूर्ण पहलू है वोट देते समय कमजोर वर्गो को दिया जाने वाला संरक्षण। जैसा मैं कह चुका हूं, हमारी चुनाव प्रणाली, हमारा प्रजातंत्र सुचारु रूप से चले हैं ; परंतु कुछ कमजोर स्थल हैं और इन कमजोर स्थलों में से एक यह है कि सामंती तत्व कमजोर वर्गो - अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं को वोट देने के लिए निकलने से रोकते हैं। कभी-कभी उन्हें घर से निकलने ही नहीं दिया जाता; कभी-कभी उन्हें पोलिंग बूथों पर पहुंचने से रोका जाता है। निस्संदेह, यह कई कारणों में से एक है।

पोलिंग बूथों पर कब्जा करने को एक सं™ोय अपराध और उसे एक भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में लाने से हम समझते हैं कि कमजोर वर्गो के हाथ सचमुच मजबूत किए जा सकेंगे। हमने कुछ अपराधों की सूची भी बनाई है जिनमें लिप्त होने वाले लोगों को चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जाएगा। हमने विशेष रूप से उन अपराधों को शामिल किया है, जो समाज-विरोधी हैं और जनता के किसी निश्चित वर्ग की गरिमा का हनन करते हैं। वह कमजोर तबके के लोग ही हैं जिनके खिलाफ उन अपराधों को अंजाम दिया जाता है और कानून में इन प्रावधानों को शामिल करके कमजोर वर्गो को संरक्षण देने का यह हमारा गंभीर प्रयास है।

एक और बड़ा कदम जो हम उठा रहे हैं, वह वोट देने की निर्धारित न्यूनतम आयु को 21 से घटाकर 18 वर्ष करना।

हमें भारत के युवाओं पर पूरा भरोसा है। भारत के युवाओं ने पंचायत चुनावों और स्थानीय निकायों के चुनावों में अपनी योग्यता का प्रदर्शन किया है और हम समझते हैं कि वे अब चुनाव-प्रक्रिया में पूरी तरह से भाग लेने के लिए तैयार हैं। यह संशोधन लगभग पांच करोड़ युवाओं को हमारी चुनाव व्यवस्था के अंतर्गत ले आएगा।

एक और क्षेत्र ऐसा रहा है, जहां कुछ पार्टियों की सोच और हमारी सोच में अंतर रहा है, हम क्या प्रावधान लेकर आए हैं और बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग का सवाल क्या है हमें चुनाव आयोग पर पूरा भरोसा है और हम समझते हैं कि जो कोई भी एक बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग चाहता है, उसके मन में चुनाव आयुक्त के बारे में कुछ संदेह प्रतीत होते हैं। हमें चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर कोई संदेह नहीं है और उसे एक बहु-सदस्यीय स्वरूप देने का अर्थ होगा कि हमने किसी तरह से उनकी निष्पक्षता पर संदेह किया। हमें उसकी निष्पक्षता के बारे में कोई संदेह नहीं ं ं ं।

यह कह चुकने के बाद मैं यह भी कहना चाहूंगा कि ऐसे कई अवसर आए हैं जब चुनाव आयोग का निर्णय विवादास्पद रहा हो। उसके कई निर्णयों से विपक्ष असहमत रहता है और उसने इन्हें मुद्दे बना दिया है। हमने भी कई फैसले पसंद नहीं किए हैं और उन्हें मुद्दा बनाया है। परंतु सच्चाई यह है कि इस तरह के फैसले कमोबेश सभी के साथ हुए हैं और हमने पाया है कि चुनाव आयुक्त अपने सीमित अधिकारों के कारण बंधे हुए थे।

हमारी शिकायतें जारी रह सकती हैं; परंतु जिस प्रकार का सिस्टम था, उसमें वह जो कुछ करना चाहते थे, वह भी नहीं कर पाते थे। इसलिए हमने सोचा है कि आयोग को बहु-सदस्यीय बनाने, जैसा कुछ दलों ने सुझाया है, के बजाय हमें चुनाव आयुक्त के हाथ मजबूत करने चाहिए, क्योंकि हमें उन पर पूरा विश्वास है। यह विधेयक चुनाव आयोग के हाथ मजबूत करता है और शायद पहली बार चुनाव आयोग के पास ऐसी शक्तियां होंगी कि वह उसे दिए गए दायित्वों को पूरा कर सकें।

एक और सवाल पहचान-पत्र के बारे में आया था। मंत्रिमंडल में इस पर चर्चा के दौरान हमने स्पष्ट रूप से इस पर सहमति व्यक्त की। वास्तव में हमने पहचान-पत्रों को स्वीकृति दे दी है। हम बहु-उद्देश्यीय पहचान-पत्र-उनका स्वरूप जो भी हो- बनाएंगे। कुछ समस्याएं हैं, जैसे इनके लिए प्रशासनिक व्यवस्था क्या होगी, उसकी लागत क्या होगी, उसके लिए धन की व्यवस्था कैसे होगी और इन दोनों पहलुओं से हम कैसे निपटेंगे। परंतु इसकी प्रक्रिया हम अभी शुरू कर देंगे। परंतु देश के आकार, मतदाताओं की कुल संख्या और अन्य जटिलताओं को देखते हुए हम यह नहीं कह सकते कि हम समूची प्रक्रिया अगले आम चुनावों से पहले या एक समय-सूची के अनुसार पूरी कर लेंगे; परंतु मैं बहुत उत्सुक हूं कि इस प्रक्रिया में तेजी लाई जाए। आरंभिक चरणा में इसे पूरा करने की प्रक्रिया के दौरान ही हमें सीखना होगा, परंतु हम इसे जल्द ही पूरा होता हुआ देखना पसंद करेंगे। हम कठिनाइयों पर विजय पाकर जितनी जल्दी संभव हो, पहचान-पत्र बनाएंगे।

बहस के दौरान उठाए गए कई सवालों में से केवल दो पर मैं बात करूंगा - पहला है सरकारी खर्च पर चुनाव करवाना। समस्या यह नहीं कि चुनाव सरकारी खर्च पर हो रहे हैं या नहीं। समस्या, जैसे मैं देखता हूं, है चुनावों में धन-शक्ति का सवाल। इस संबंध में अपने अनुभव के आधार पर मैं बिल्कुल साफ बात करूंगा। मेरे मन में यह बिल्कुल साफ है कि हमारी जनता इतनी चतुर और इतनी बुद्धिमान है कि वह धनशक्ति से भ्रमित नहीं होती। इस देश में धनशक्ति कभी भी चुनावों में निर्णायक तत्व नहीं रही है, यह मेरी धारणा है। यदि कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि धनशक्ति से हमारे मतदाता भ्रमित हो सकते हैं, तो मैं समझता हूं कि वे पूरी तरह गलत हैं। केवल राजनीतिज्ञ ही कभी-कभी महसूस करते हैं कि ज्यादा धन खर्च करके वे कुछ हासिल कर सकते हैं; परंतु हमारे मतदाता इस मामले में बहुत बुद्धिमान हैं। जो धन अभी इस्तेमाल हो रहा है, राजकीय सहायता उसे कम नहीं कर सकती। वास्तव में राजकीय सहायता चुनावी गतिविधियों पर जितना धन खर्च किया जा रहा है, उसमें वृद्धि ही करेगी। वह चुनावों के लिए धन जुटाने को किसी तरह भी कम नहीं करेगी। इसलिए मैं यह नहीं देख पाता कि राजकीय धन-व्यवस्था चुनावों की लागत के मुद्दे को कैसे हल करेगी। यदि वह ऐसा कर सकती तो हम उसका प्रावधान जरूर करते। परंतु चुनावों की लागत कम करने की आवश्यकता मैं भी महसूस करता हूं। यदि माननीय सदस्यों के पास इस पर कोई सकारात्मक सुझाव है तो हम निश्चित रूप से उस पर विचार करेंगे। परंतु इस मुद्दे पर अभी तक कोई ठोस सुझाव नहीं आया है। मैं एक बार फिर कहूंगा कि मेरे मन में यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि हम भारत के मतदाता को खरीद नहीं सकते। भारत का मतदाता इतना स्वतंत्र और बुद्धिमान है कि ऐसा होना संभव नहीं है।

महोदय, जो दूसरा सवाल उठाया गया था - मैं समझता हूं, उसका जवाब देना जरूरी है - वह यह है कि कुछ सदस्यों की राय में इस विधेयक में विषय की तह तक जाने वाले मुद्दों को छोड़कर केवल परिधि पर स्थित समस्याओं का निराकरण किया गया है। इस बारे में मैं इतना ही कहूंगा कि कुछ सदस्य निकट दृष्टिता के शिकार मालूम होते हैं।

मैं यह बिल्कुल साफ तौर कहना चाहूंगा कि यह एक प्रमुख विधेयक है। यह एक व्यापक चुनाव सुधार है। मैं तो इसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कहने की हद तक जाऊंगा। और एक खास बात यह है कि हम इसे पंडितजी की जन्म-शताब्दी के वर्ष में लेकर आए हैं। यह हमारे प्रजातंत्र की जड़ों को मजबूत करेगा और यह भारत के युवाओं में व भारत की जनता की बुद्धिमत्ता में कांग्रेस के विश्वास की पुनस्र्थापना करता है।

(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित और रुद्रांक्षु मुखर्जी द्वारा संपादित पुस्तक 'भारत के महान भाषण' से साभार।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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