बेहद खतरनाक है राजनीति का सामंती चरित्र

नई दिल्ली, 14 जनवरी (आईएएनएस)। बीते दिनों मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल जाने का मौका मिला। उस समय नगर निगम चुनावों का माहौल था। चुनाव प्रचार के लिए लगे होर्डिग्स से मुझे राजनीति में आए बदलावों की एक झांकी मिली। इन होर्डिग्स पर जिस तरह लोगों की तस्वीर थी उससे साफ है कि राजनैतिक व्यवस्था अब जनता के लिए बची ही नहीं।

विभिन्न राजनीतिक दलों की तरफ से लगाए गए होर्डिग्स में एक ही तरह के चरित्र वाले अलग-अलग चेहरों को देखकर यह भी लगा कि दलीय राजनीति का कोई औचित्य अब नहीं बचा है। इन होर्डिग्स में जिन लोगों की बड़ी-बड़ी तस्वीर लगी हुई थी उनमें से सिर्फ 20 की ही आजीविका के बारे में पता करने पर यह बात सामने आई कि इनमें से आधे से ज्यादा तो बिल्डर और डेवलपर्स हैं।

यह बात भी सामने आई कि जिसकी तस्वीर जितनी बड़ी है, उसकी साख उतनी ही खराब है। ये ऐसे लोग हैं जिनके बारे में यह कहने की जरूरत नहीं है कि इनके लिए मूल्यों और मुद्दों की राजनीति का कोई अर्थ नहीं है।

मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था का दोहरापन यहीं झलकता है। एक तरफ तो ऐसे लोग मुख्यधारा वाले राजनीतिक दलों का चेहरा बन रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ सामान्य कार्यकर्ता उदात्त भाव से काम में लगा हुआ है। आम कार्यकर्ता देश कल्याण के भाव से काम किए जा रहा है। इन्हीं आम कार्यकर्ताओं की भावनाओं का इस्तेमाल होर्डिग्स में दिखने वाले लोग कर रहे हैं। यह किसी एक दल की बात नहीं है, बल्कि सभी दलों में ऐसा हो रहा है।

हर दल ने अपने हिसाब से ऐसे लोगों की अलग-अलग जमात पाल ली है। दरअसल, ऐसा किए जाने के पीछे वह सोच काफी हद तक जिम्मेदार है जो राजनीति को कैरियर के एक विकल्प के तौर पर देखती है। अब तो बात और आगे बढ़ गई है। इस समय ऐसे लोग भी राजनीति में आ रहे हैं जो इसे सिर्फ पेशा ही नहीं बल्कि व्यवसाय भी मानने लगे हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि जो चरित्र चुनाव प्रचार के दौरान होर्डिग्स में दिखता है, वही चरित्र विधानसभाओं और संसद का भी बन गया है। इन सदनों में भी होर्डिग्स वाले लोग पहुंच रहे हैं।

ऐसे लोगों के वादे व नारे और इनके काम में आकश-पाताल का अंतर दिखता है। कहा जा सकता है कि अब देश की राजनीति ऐसे मोड़ पर आ गई है जहां पिछले 20 सालों से इस पर धनबन के पड़ते प्रभाव से पर्दा हट गया है। सार्वजनिक तौर पर राजनीति को पहनाया गया समाज सेवा का जामा भी अब हट गया है। इन बातों का असर कुछ ऐसा हुआ कि राजनीति में कुछ भी किया जाना जायज हो गया।

धनबल के प्रभाव से उपजी राजनीति ने मीडिया के चरित्र में बदलाव लाने की सफल कोशिश की है। कम से कम मुख्य धारा की मीडिया को तो सियासत के नए चलन ने साध लिया है। आज हालात यह हो गई है कि कलम की ताकत का नेता और नौकरशाह दोनों अपने हित में इस्तेमाल करने लगे हैं।

नेताओं ने इसके लिए मीडिया में लगने वाले पैसे का चरित्र बदला। मीडिया कंपनियों को अपना कारोबार बढ़ाने के लिए रियल एस्टेट और खनन क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित किया गया। दूसरी तरफ रियल एस्टेट और खनन क्षेत्र की कंपनियों ने अपने कारोबार का विस्तार मीडिया क्षेत्र में किया। इसका असर यह हुआ कि जिस मीडिया को राजनीति पर धनबल के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ खड़ा होना चाहिए था, वह खुद ही ऐसा काम करने लगी जिससे राजनीति पर धनबल का प्रभाव और बढ़े। इन सब का मिलाजुला असर यह हुआ कि देश में इस समय एक बेहद खतरनाक गठजोड़ बन गया है।

इस गठजोड़ में नेता, नौकरशाह, मीडिया, कॉरपोरेट घराने, अपराधी और ठेकेदर शामिल हैं। सामान्य कार्यकर्ता इन परिस्थितियों से इस कदर हताश हो गया है कि वह भी इसी गठजोड़ में अपनी हिस्सेदारी ढूंढने लगा है। क्योंकि उसे और कोई दूसरा रास्ता दिख ही नहीं रहा है। इस खतरनाक गठजोड़ की वजह से जनता की खून-पसीने की कमाई का जमकर दुरुपयोग हो रहा है।

इस वजह से कई तरह की विसंगतियां पैदा हो रही हैं। एक तरफ लुटेरे बढ़ रहे हैं और दूसरी तरफ भिखारी। देखा जाए तो मौजूदा व्यवस्था अरबपति बनाम आम आदमी हो गई है। यही वजह है कि देश की कुल जीडीपी का एक चौथाई महज सौ लोगों के पास है और दूसरी तरफ देश के 84 करोड़ लोगों को अपना जीवन बसर 20 रुपये रोजाना की आमदनी पर करना पड़ रहा है।

देश में एक साल में अरबपतियों की संख्या 28 से बढ़कर 54 हो गई है। इस एक साल के दौरान अरबपतियों की संपत्ति में 60 फीसदी बढ़ोतरी हुई है लेकिन इन्हीं अरबपतियों की कंपनियों में काम करने वाले लोगों के पगार में बढ़ोतरी की बात तो दूर उनके वेतन में कटौती हुई है। कई कंपनियों ने मंदी की आड़ में कर्मचारियों की छंटनी की और बचे कर्मचारियों पर अतिरिक्त काम का बोझ डाल दिया।

ऐसे समय में जब देश की बड़ी आबादी 20 रुपये में अपना हर दिन गुजारने को मजबूर है, जब महंगाई चरम पर है, ऐसे मुश्किल वक्त में सरकार बुनियादी सुविधाओं को भी निजीकरण के नाम पर पूंजीपतियों के हवाले करती जा रही है। जले पर नमक छिड़कना शायद इसी को कहते हैं।

देश के प्रधानमंत्री देशी-विदेशी मंचों पर भारत के कथित विकास पर इतराते हुए दिखते हैं। पर अहम सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच भारत का विकास हो रहा है। सच तो यह है कि बाहरी विकास के साथ-साथ भीतरी विनाश भी हो रहा है।

धनबल और बाहुबल के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ राजनीति में वंशवाद की बढ़ती बीमारी नए जमींदारों को पैदा कर रही है। राजनीति का चरित्र सामंतवादी होता जा रहा है। कहना न होगा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत के लिए ऐसा होना बेहद खतरनाक है।

विकास का भ्रम दुनिया भर में कुछ इस तरह से पैदा किया गया है कि ज्यादातर देश अमेरिकीकरण में लगे हुए हैं। पर सच तो यह है कि अमेरिकीकरण की कोशिश में इन देशों का अफ्रीकीकरण ही हो रहा है। समय रहते ये देश अगर नहीं चेते तो इनका सोमालिया, लाइबेरिया, जिम्बाम्बे, इथियोपिया जैसे देशों की कतार में शामिल होना इनकी नियति बन जाएगी।

अराजकता के भंवर में फं से ये देश कहीं के नहीं रहेंगे। इस बात को समझने के लिए भारत का उदाहरण लिया जा सकता है। अमेरिकीकरण की कोशिश में भारत अपनी जड़ों से तो कटता ही जा रहा है साथ ही साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर असंतुलन बढ़ता ही जा रहा है।

सवाल यह है कि ऐसी परिस्थिति में सार्थक राजनीति के लिए क्या संभावनाएं हैं? ये संभावनाएं कहां हैं और किस रूप में हैं? सवाल यह भी है कि क्या आगे की चुनौतियों का सामना मौजूदा राजनीतिक उपायों से किया जा सकेगा?

दरअसल, संकट पूरी व्यवस्था का है। इसलिए मरम्मत भी हर स्तर पर किए जाने की जरूरत है। मरम्मत के लिए बौद्धिक, रचनात्मक और आंदोलनात्मक रास्ते अपनाने होंगे। गैर पारंपरिक और शांतिपूर्ण तरीकों के जरिए शक्ति प्रदर्शन करके जरूरी दबाव बनाना होगा। अब चुनौतियां नए तरह की हैं। इसलिए इनसे पार पाने के लिए पारंपरिक औजार बहुत ज्यादा काम नहीं आएंगे। इनसे निपटने के लिए नए औजार विकसित करने होंगे। नए औजारों को चलाने के लिए जाहिर है कि नए लड़ाकों की जरूरत होगी। इन्हीं नए लड़ाकों और नए औजारों के जरिए नया ढांचा तैयार होगा और राह भटकी व्यवस्था को वापस पटरी पर लाया जा सकेगा। ऐसा किया जाना वक्त की जरूरत बन गया है।

ऐसा नहीं करने से अराजकता को भुनाने में लगी ताकतों को फायदा मिलेगा। फिर लोकतंत्र में जनता के द्वारा चुनी गई सरकार जनता की नहीं होगी। ऐसी सरकार जनता के लिए काम नहीं करेगी। इसका चुनाव भले ही जनता द्वारा होगा लेकिन यह कुछ लोगों के लिए ही काम करेगी। जाहिर है कि ऐसे लोग वो होंगे जिन्होंने व्यवस्था का चरित्र बिगाड़ने का काम किया है।

(साभार : भारतीय पक्ष)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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