प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय आरटीआई के दायरे में : उच्च न्यायालय (लीड-1)

मुख्य न्यायाधीश ए.पी.शाह और न्यायाधीश एस.मुरलीधर तथा विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने कहा, "अधीनस्थ न्यायपालिका पहले ही संपत्तियों की घोषणा कर रही है। इसलिए जब वे जवाबदेह हैं तो हम भी हैं। इस प्रकार न्यायपालिका में जो जितना बड़ा है, जनता के प्रति उसकी जवाबदेही उतनी ही बड़ी है।"

फैसला सुनाते समय न्यायाधीशों ने आश्वस्त किया कि वे भी अगले सप्ताह अपनी संपत्तियों की घोषणा करेंगे।

आरटीआई के महत्व पर जोर देते हुए खंडपीठ ने कहा कि आरटीआई का प्रभाव बहुत अधिक है। ऐसी जानकारी चाहने वाले नागरिकों को इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए, इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचेगी।

खंडपीठ ने एक बड़े फैसले में कहा, "आयकर विवरण और चिकित्सा दस्तावेजों का खुलासा आरटीआई के तहत नहीं किया जाएगा लेकिन यदि इससे जनहित जुड़ा हो तब इसका भी खुलासा किए जाने की आवश्यकता होगी।"

वर्ष 1997 और 1999 में दो प्रस्तावों में कहा गया कि न्यायाधीशों के लिए संपत्तियों की घोषणा बाध्यकारी नहीं वरन ऐच्छिक हो सकती है। इस संबंध में न्यायालय ने कहा, "प्रस्ताव को न्यायाधीशों की जवाबदेही के लिए बनाया गया है और हमें समान रूप से इसका पालन करना चाहिए।"

खण्डपीठ ने इस मामले पर नवंबर 2009 में फैसला सुरक्षित रखा था।

सर्वोच्च न्यायालय रजिस्ट्री की ओर से उपस्थित अटॉर्नी जनरल ई.वाहनवती ने तर्क दिया कि न्यायाधीशों की संपत्ति की घोषणा संबंधी प्रस्ताव गैर संवैधानिक, गैर बाध्यकारी है और यह किसी न्यायाधीश को देश के प्रधान न्यायाधीश के समक्ष अपनी संपत्ति घोषित करने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने दो सितम्बर 2009 को इस विवादास्पद मुद्दे पर अपने फैसले में कहा था कि प्रधान न्यायाधीश का कार्यालय एक सार्वजनिक अधिकरण है और उनका कार्यालय भी पारदर्शिता के लिए बने कानून के दायरे में आता है।

यह फैसला प्रधान न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन के रुख के विपरीत है। बालाकृष्णन लगातार कहते रहे हैं कि उनका कार्यालय आरटीआई कानून के दायरे से बाहर है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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