अफगानिस्तान युद्ध में नाटो निर्णायक बिंदु पर
काबुल, 31 दिसम्बर (आईएएनएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सैनिकों की वापसी की समय सीमा तय करने को इस बात का संकेत माना जा रहा है कि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की सेनाएं भी अफगानिस्तान को उसी तरह छोड़ने की तैयारी में हैं, जैसे सोवियत संघ ने छोड़ा था।
अफगान सेना के अवकाश प्राप्त कर्नल गुलाम रब्बानी (62 वर्ष) ने कहा कि जब रूसियों को यह समझ में आ गया कि वे अफगानिस्तान युद्ध नहीं जीत सकते तो उन्होंने वापस लौटने और देश की सुरक्षा के लिए अफगान सेनाओं की मदद का फैसला किया। रूसियों के वापस लौटने के बाद पड़ोसियों ने अफगानिस्तान को तबाह कर दिया।
कम्युनिस्ट और इस्लामी शासन के तहत सेना अधिकारी और प्रशिक्षक के रूप में 20 वर्ष बिताने वाले रब्बानी ने कहा कि ऐसे संकेत हैं कि नाटो भी ऐसा ही करने जा रहा है।
नाटो के अन्य सदस्य देशों ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने भी अपनी सेनाओं की वापसी के संकेत दिए हैं और भविष्य की सैनिक कार्रवाइयों पर चर्चा के लिए जनवरी 2010 में लंदन में एक बैठक आयोजित की है।
नाटो सेनाओं की वापसी की तैयारी ऐसे समय हो रही है जब अफगानिस्तान में सुरक्षा काफी कमजोर पड़ चुकी है, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, अर्थव्यवस्था नशीले पदार्थो पर टिकी है और पाकिस्तान से लगी सीमा पर आतंकवादियों की सुरक्षित पनाहगाहें कायम हैं।
पश्चिमी नेताओं का कहना है कि सैन्य वापसी की समय सीमा का उद्देश्य प्रशासन और सुरक्षा की बड़ी जिम्मेदारी उठाने के लिए राष्ट्रपति हामिद करजई की सरकार पर दबाव बढ़ाना है। परंतु विश्लेषकों का मानना है कि इसका प्रमुख कारण अफगानिस्तान में सैनिकों की बढ़ती मौतों से नाटो देशों में बढ़ता जनाक्रोश है।
वर्ष 2009 में अफगानिस्तान में 490 नाटो सैनिकों की मौत हुई। इनमें अमेरिका के 300 और ब्रिटेन के 100 सैनिक शामिल हैं। वर्ष 2001 के बाद से इस वर्ष सबसे अधिक नाटो सैनिकों की मौत हुई। अमेरिका और ब्रिटिश सैनिकों की एक-तिहाई से अधिक मौतें इस वर्ष हुईं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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