बांग्लादेश में मिली टैगोर की कुर्सी और चायदानी
समाचार पत्र 'द डेली स्टार' के मुताबिक टैगोर की धरोहरों को अपने पास रखने वाला पातीसार कचाड़ीबारी संग्रहालय इन वस्तुओं को अपने संग्रह में शामिल करना चाहता है। यद्यपि इस संग्रहालय में जो वस्तुएं हैं वह उपेक्षित और बुरी स्थिति में हैं।
टैगोर की यादगार वस्तुएं इकट्ठी करने के प्रति उत्साहित एम. मतीउर रहमान मामून ने पहले ही कई यादगार वस्तुएं इकट्ठी की हैं। इनमें एक दुर्लभ खत, खातों का रजिस्टर, एक बिस्तर और दो दर्पण शामिल हैं। नौगांव व नातोर जिले के गांवों से ये वस्तुएं प्राप्त हुई थीं, जिन्हें पातीसार कचाड़ीबारी संग्रहालय में रखा गया है।
पुरातत्व विभाग के एक कर्मचारी गयासुद्दीन का कहना है कि नौगांव जिले के अत्री उपजिले के तहत आने वाले मस्कीपुर गांव के जहुरुल हक ने संग्रहालय को हाल ही में टैगोर की एक टूटी हुई कुर्सी सौंपी है।
रहमान कहते हैं कि जहुरुल के पिता दिवंगत मुबारक हुसैन टैगोर के यहां काम करते थे।
नाटोर जिले के सदनागोर गांव के मोहम्मद अब्दुस समद ने भी इस साल जुलाई में टैगोर की एक कुर्सी सौंपी थी।
रहमान ने कुछ महीने पहले ही मस्कीपुर गांव से टैगोर की एक चायदानी भी हासिल की थी, जिसे संग्रहालय में रखा गया है।
टैगोर की कई यादगारें भारत के पश्चिम बंगाल में टैगोर द्वारा स्थापित शांतिनिकेतन विश्वविद्यालय में संरक्षित हैं। इनमें टैगोर को 1913 में मिला साहित्य का नोबेल पुरस्कार भी शामिल था लेकिन कुछ समय पहले ही यह पुरस्कार गायब हो गया था।
बांग्लादेश और भारत दोनों ही देशों में टैगोर का विशेष सम्मान किया जाता है। इन दोनों राष्ट्रों के राष्ट्र गान टैगोर ने ही लिखे हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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