चालू वित्त वर्ष में 7.75 फीसदी विकास दर का अनुमान (लीड-1)

संसद में मध्यावधि वित्त समीक्षा पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि बाहरी और घरेलू अर्थव्यवस्था में महत्वूपर्ण परिवर्तन आया आया है।

आर्थिक मोर्चे पर अब तक की उपलब्धियों और आगे की चुनौतियों के बारे में पेश 126 पृष्ठों के समीक्षा दस्तावेज में कहा गया है, "वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 7.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है और ऐसे में कहा जा सकता है कि अनिश्चितता के बादल छंट गए हैं।"

वित्त मंत्रालय द्वारा सर्वाधिक अनुकूल स्थिति में विकास की दर 7.75 फीसदी रहने के अनुमान की याद दिलाते हुए इसमें कहा गया है, "अगले दो तिमाहियों और पूरे वर्ष के लिए विकास दर अनुमानित दर तक या उससे ऊपर पहुंचने की संभावना है।"

समीक्षा में महंगाई के मोर्चे पर सरकार की चिंताओं को भी शामिल किया गया है। इसमें आलू, प्याल, अनाज और दालों की औसत कीमत में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी की चर्चा है।

इसमें कहा गया है, "उपभोग की प्राथमिक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि चिंता का विषय है और इसपर काबू पाने के लिए तुरंत प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।"

दस्तावेज में मुखर्जी ने कहा, "वर्तमान में कीमतों में जो वृद्धि दिख रही है उसका आशय देश में इन वस्तुओं की मांग में तेजी से नहीं है।"

उन्होंने कहा, "इसका मुख्य कारण आपूर्ति के स्तर पर बाधा का होना है। खाद्यानों के उत्पादन में कमी या कमी की आशंका के कारण ऐसा हुआ है।"

समीक्षा दस्तावेज में अन्य निम्न बातों पर चिंता जाहिर की गई है :

- वैश्विक मंदी से निपटने के लिए उठाए गए कदमों के कारण उच्च राजकोषीय घाटा।

-रुपये की कीमतों और निर्यात के क्षेत्र में प्रतियोगिता के कारण पूंजी की आवक का नकारात्मक प्रभाव।

- वर्ष 1990 के बाद कृषि उत्पादन में ठहराव।

- किसानों के लिए खराब मूलभूत सुविधाएं।

- ऋण क्षेत्र में विकास में सुस्ती विशेषकर उद्योग जगत में।

- विकास और महंगाई के बीच संतुलन साधने में रिजर्व बैंक की दुविधा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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