पोलियो विरोधी अभियान के झंडाबरदार बन गई है मुसहर जाति
सहरसा(बिहार), 7 दिसम्बर (आईएएनएस)। चूहों को निवाला बनाने की आदिम प्रवृत्ति के कारण हिकारत भरी नजरों से देखे जाने वाली मुसहर जाति बिहार में पोलियो विरोधी अभियान का झंडारबरदार बन गई है। गरीबी, निरक्षरता और उपेक्षा का दंश झेलने वाले मुसहर इस राज्य को पोलियो के खिलाफ जंग में भरपूर मदद दे रहे हैं।
जब चार महीने पहले सहरसा जिले में राष्ट्रीय पोलियो निगरानी परियोजना (एनपीएसपी) के तहत पोलियो टीम यहां पहुंची थी तो उसे यह चिंता सताने लगी थी कि यहां मुसहर जाति के लोगों में निरक्षरता का स्तर काफी उच्च होने के कारण उन्हें इस अभियान में सहयोग देने के लिए प्रेरित करना कठिन होगा। पोलियो टीमों को यहां के 112,000 से अधिक मुसहरों के साथ संवाद कायम करने में मुश्किलें आने लगीं।
सहरसा के आरापट्टी प्रखंड में मुरली गांव के प्रखंड समन्वयक भगवान चौधरी कहते हैं,"यहां के तकरीबन 95 फीसदी मुसहर अशिक्षित हैं। वे हमारी भाषा नहीं समझते हैं। ऐसे में उन्हें इस अभियान के फायदों से अवगत कराना कठिन था। चार महीने पहले हमने इस जाति से पांच लोगों का चयन कर उन्हें सामुदायिक समन्वयक के तौर पर प्रशिक्षित किया।"
चौधरी बताते हैं कि इन पांच लोगों को प्रशिक्षित करना भी आसान नहीं था, क्योंकि वे पढ़े लिखे नहीं थे। उन्हें पोस्टरों, नु क्कड़ नाटकों एवं खेलों के जरिए प्रशिक्षित किया गया। समन्वयक का प्रशिक्षण हासिल करने वाले सुरेश सदा का कहना है, "पोलियो टीकाकरण से पहले हम गांवों में घूम-घूमकर अपनी जाति के लोगों को टीकाकरण के फायदे बताते हैं। शुरू में तो लोग सहयोग करने से कतराते थे, पर अब इस अभियान को लेकर मुसहरों में गजब का उत्साह है।"
चौधरी कहते हैं कि पोलियो टीकाकरण को सफल बनाने में इस जाति के लोग अब बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं। सदा और उनके साथी को इस मेहनत के बदले सप्ताह में बमुश्किल 175 रुपए ही मिलते हैं, पर उन्हें इस अभियान के लिए रोजाना 10 से 14 घंटे तक मेहनत करने पर गर्व है। इस समुदाय के एक और कार्यकर्ता राम चरन कहते हैं, "हम पांच वर्षो से कम उम्र के बच्चों की सूची तैयार करने से लेकर उनके परिवारों को टीके के लिए जागरूक करने की जिम्मेवारी पूरी करते हैं। हमें अपने कार्य पर गर्व है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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