गैस पीड़ितों के इंजेक्शन की लड़ाई में हुई जेल
इंदौर की रहने वाली साधना भोपाल गैस त्रासदी से पहले शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय एक संगठन के लिए काम करती थीं। गैस त्रासदी की विभीषिका उन्हें काम करने के लिए भोपाल खींच लाई।
साधना कहती हैं कि 2-3 दिसंबर 1984 की रात यूनियन कार्बाइड संयंत्र से रिसी मिथाइल आइसोसायनेट ने ऐसी तबाही मचाई कि उसने हजारों लोगों को अपना ग्रास बना लिया, हजारों लोग मरे, यह हर कोई मानता है मगर संख्या को लेकर मतभेद है। इतना ही नहीं गैस की जद में आए लोगों की मौत का सिलसिला आज भी जारी है।
साधना बताती हैं कि हादसे के बाद यूनियन कार्बाइड का फैक्स आया कि पीड़ितों को सोडियम थायो सल्फेट का इंजेक्शन लगाया जाए। परंतु कुछ समय बाद ही एक अन्य फैक्स आया कि इस इंजेक्शन को नहीं लगाया जाए। उनका आरोप है कि डाव केमिकल्स को लगा कि इस इंजेक्शन से इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि हजारों लोग मिक गैस के कारण मरे हैं, लिहाजा इंजेक्शन को ही लगाना बंद कर दिया गया। यह ऐसा इंजेक्शन है जो शरीर में फैले जहरीले सायनाइड को थायो सल्फेट के रूप में पेशाब के साथ शरीर से बाहर निकालता है।
उन्होंने बताया कि जर्मनी से एक चिकित्सक सोडियम थायो सल्फेट का इंजेक्शन लेकर भोपाल आया तो वह इंजेक्शन पीड़ितों को लगाए गए। इस इंजेक्शन से लाभ हुआ तो बाद में गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ने वाले जहरीली गैस कांड संघर्ष मोर्चा ने संयंत्र परिसर में क्लीनिक खोलकर इंजेक्शन लगाने का सिलसिला शुरू किया। सरकार ने जब इंजेक्शन नहीं उपलब्ध कराए तो उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर इंजेक्शन की आपूर्ति की गई।
सोडियम थायो सल्फेट इंजेक्शन लगाने का अभियान तीन साल ही चल सका। इस दौरान 5000 लोगों को 25 हजार इंजेक्शन लगाए गए। इसके सार्थक नतीजे आने का साधना दावा करती हैं।
साधना का आरोप है कि जब सरकार को लगने लगा कि इस इंजेक्शन से यह बात प्रमाणित हो जाएगी कि हजारों लोगों की मौत मिक से हुई है तो वह डाव केमिकल्स की उतनी मदद नहीं कर पाएगी जो वह करना चाहती है। इसी के चलते उसने साजिश रचकर 1987 में उन्हें तथा पांच चिकित्सकों सहित 15 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें 15 दिन तक जेल में रहना पड़ा। जब वह जेल से छूटकर आईं तो उस अभियान को उस तरह नहीं चला पाइर्ं जैसा कि चलाना चाहती थीं।
गैस हादसे के समय मरीजों का उपचार करने और गैस राहत अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सक भी मानते हैं कि सोडियम थायो सल्फेट इंजेक्शन मरीजों के उपचार में मददगार होता है मगर इस बात को लेकर भ्रम हो गया था कि कितने दिन के बाद तक मरीज को इसका डोज दिया जाना चाहिए। लिहाजा उस पर रोक ही लगा दी गई थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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