भोपाल के भू-जल में 40 गुना घातक कीटनाशक (लीड-1)
यह खुलासा नई दिल्ली के अनुसंधान और आंदोलन संगठन एवं सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट(सीएसई) की रिपोर्ट ने किया है। सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण और संयुक्त निदेशक चंद्र भूषण ने मंगलवार को सीएसई प्रयोगशाला के अध्ययन और निष्कर्षो का हवाला देते हुए बताया कि संयंत्र के भीतर और बाहर तीन किलोमीटर की दूरी तक से लिए गए भू-जल के नमूनों में जहरीले पदार्थ पाए गए हैं।
उन्होंने कहा कि इन नमूनों में पाए गए जहरीले पदार्थ के रसायन का चरित्र संयंत्र में जमा कचरे के रसायनों के चरित्र से मेल खाता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाया गया रसायन क्लोरिनेटिड बेंजीन मिश्रणों और कीटनाशक का स्त्रोत यूसीआईएल के अतिरिक्त अन्य कोई स्त्रोत नहीं हो सकता है।
सुनीता नारायण और चंद्र भूषण ने बताया कि यूसीआईएल में कारबालीन, एल्डिकार्ब और गामा हेक्साक्लोरो साइक्लोहेक्सेन नाम के तीन कीटनाशकों का उत्पादन किया जाता था। संयंत्र में पारा और क्रोमियम जैसी भारी धातुओं का इस्तेमाल किया जाता था। सीएसई प्रयोगशाला ने अपने परीक्षण के लिए इन्हीं रसायनों का चयन किया।
संस्थान ने अपनी जांच के लिए संयंत्र परिसर के भीतर से मिट्टी का एक और पानी के आठ नमूने लिए। इतना ही नहीं संयंत्र की सबसे नजदीकी बस्ती और साढ़े तीन किलो मीटर दूर तक की कालोनी से 11 पानी के नमूने लिए गए। यह इसी साल अक्टूबर माह में हुआ। इन सभी नमूनों की जांच में उच्च स्तर का प्रदूषण पाया गया है।
जांच रिपोर्ट के अनुसार इन नमूनों में जो रसायन अधिकता में पाए गए हैं वे शरीर के लिए घातक हैं। इनमें से क्लारीनेटिड बेंजीन मिश्रण की अधिकता जिगर एवं रक्त कोशिकाओं को प्रभावित तथा नष्ट तक कर सकती है। इसके अलावा ऑर्गेनाक्लोरीन कीटनाशक कैंसर और हड्डियों की विकृतियों के जनक हो सकते हैं। वहीं कारबारिल और एल्डिकार्ब नामक उत्पाद भी उतने ही घातक थे। इससे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है जिसमें मस्तिष्क तथा तंत्रिका प्रणाली को नुकसान, गुणसूत्रों की गड़बड़ी भी हो सकती है।
सुानीता नारायण ने प्रयोगशाला अध्ययन और उसके निष्कषरें के आधार पर बताया कि भोपाल में संयंत्र क्षेत्र भीषण विषाक्तता को जन्म दे रहा है और लगातार हो रहा सूक्ष्म संपर्क हमारे शरीर में जहर घोलने का काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि संयंत्र की जमीन में मौजूद रसायन भूजल में घुल रहे हैं और यह जहर धीरे-धीरे यहां के निवासियों के शरीर को अपना शिकार बना रहा है। स्ांयंत्र की आसपास की बस्तियों में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि वहां के निवासी अभी तक असाध्य रोगों से लेकर विकृतियों से जूझ रहे हैं।
स्ांयंत्र को आम लोगों को खोलने के लिए चल रही कोशिशों और कचरे को खतरनाक न मानने के सवाल पर सुनीता नारायण ने कहा कि यह घोर विषाक्तता से भिन्न है और इसलिए यह दावा करना कि कचरा छूने से कुछ नहीं होगा इसलिए संयंत्र खतरनाक नहीं है। यह भ्रामक है। वे संयंत्र को खोलने के पक्ष में नहीं हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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