वन भूमि पर काबिज जनजाति परिवारों पर ढाए जा रहे हैं जुल्म

हरदा जिले में अनुसूचित जनजाति के परिवारों पर हो रहे अत्याचारों की शिकायत मिलने पर दिल्ली से आए पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स के जांच दल ने यह खुलासा किया है। संगठन का चार सदस्यीय दल यहां आया था, जिसने यहां के दो गांव ढेगा और उचा बरारी का दौरा करने के बाद पाया कि वन अधिकार कानून के प्रावधानों का खुलकर उल्लंघन हो रहा है। इतना ही नहीं प्रदेश सरकार द्वारा तय किए गए निर्देशों का भी पालन करने में लापरवाही हो रही है। वन विभाग का अमला तो बर्बरता पूर्वक कार्रवाई करने में भी पीछे नही हैं।

पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स की सचिव मौसमी बासू और सदस्य हरीश धवन ने पत्रकारों को मंगलवार को बताया है कि उनके संगठन के जांच दल ने जिन दो गांवों का भ्रमण किया है वहां कोई ग्राम सभा की बैठक नहीं हुई और कुछ ग्रामीणों को जो पट्टे दिए गए है वे उनके जोत क्षेत्र से मेल नहीं खाते हैं। इतना ही नहीं वन विभाग पीढ़ियों से काबिज जनजातियों के परिवारों को बेदखल करने में लगा है।

संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक इस वर्ष खरीफ फसल के दौरान ग्रामीणों को खेती करने से रोका गया। पहले तो फसल बोने से रोका गया और जिन्होंने ऐसा किया है उनकी फसल उजाड़ दी गई। कुछ क्षेत्रों में तो जबरन बबूल और जेट्रोपा के बीज बिखेरे गए हैं। जो इस तरह की कार्रवाई का विरोध करता है उसे जेल तक जाना पड़ रहा है। ऐसा श्रमिक आदिवासी संगठन के कई कार्यकर्ताओं के साथ हुआ भी है।

जांच दल के अनुसार हरदा जिला प्रशासन द्वारा वनवासी परिवारों को एक आवेदन भेजकर उनसे जमीन पर काबिज होने का प्रमाण मांगा जा रहा है। संगठन का आरोप है कि यह प्रक्रिया वन भूमि पर काबिज परिवारों को कानूनी दावपेंच में उलझाने के लिए अपनाई जा रही है। इस तरह का कोई प्रावधान वन अधिकार कानून में नहीं है। नियम के मुताबिक तो इन परिवारों को जमीन का पट्टा पाने के लिए गांव से ही बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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