फ़िल्मों में धूम्रपान के दृश्यों से रोक हटी

हाईकोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा है कि धूम्रपान ज़िंदगी की वास्तविकता है और फ़िल्मों में इसे दिखाने पर रोक लगाने से फ़िल्म निर्माताओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता है.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अक्तूबर, 2005 से फ़िल्मी पर्दे पर धूम्रपान के दृश्य दिखाने पर रोक लगा दी थी.
इस फ़ैसले का फ़िल्म जगत ने विरोध किया था और कहा था कि यह कलात्मक अभिव्यक्ति में रुकावट पैदा करना है.
'ग़लत निशाना'
केंद्र सरकार के इस फ़ैसले को फ़िल्म निर्माता महेश भट्ट ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
पचास पृष्ठों के अपने फ़ैसले में न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने कहा है, "सिनेमा में असली ज़िंदगी की तस्वीर दिखाई पड़नी चाहिए. धूम्रपान जीवन की असलियत है. यह अपेक्षित नहीं है लेकिन यह असलियत जीवन में मौजूद है और इस पर किसी क़ानून के तहत रोक नहीं है."
फ़ैसला जब तक धूम्रपान को महिमामंडित न किया जा रहा हो या फिर किसी उत्पाद विशेष का प्रचार न किया जा रहा हो तो इस तरह की रोक जीवन की सच्चाई दिखाने पर रोक लगाने जैसा होगा दिल्ली हाईकोर्ट
| |
न्यायाधीश ने अपने फ़ैसले में कहा है, "जब तक धूम्रपान को महिमामंडित न किया जा रहा हो या फिर किसी उत्पाद विशेष का प्रचार न किया जा रहा हो तो इस तरह की रोक जीवन की सच्चाई दिखाने पर रोक लगाने जैसा होगा."
उन्होंने कहा कि फ़िल्मों में धूम्रपान के दृश्यों पर रोक लगाना फ़िल्म निर्माताओं की रचनात्मकता और कलात्मक अभिव्यक्ति के क्षेत्र में अतिक्रमण करने जैसा होगा.
जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह प्रतिबंध लगाया था तो तर्क दिया था कि भारत में हर साल आठ लाख लोग धूम्रपान करने के कारण मौत का शिकार होते हैं और फ़िल्मों और टीवी कार्यक्रमों में इसे दिखाने से यह आदत महिमामंडित होती है.
इसका विरोध करते हुए फ़िल्म निर्माताओं ने कहा था कि सरकार ग़लत निशाना लगा रही है.
उनका कहना था कि यदि सरकार सच में प्रतिबंध लगाना चाहती है तो तंबाकू उत्पादकों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए.
हालांकि विश्वस्वास्थ्य संगठन ने भारत सरकार के फ़ैसले का स्वागत किया था. उसका तर्क था कि 'आकर्षक लोगों' को सिरगेट पीते देखकर युवाओं पर ग़लत असर पड़ता है.
भारत सरकार ने वर्ष 2008 में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करने पर भी रोक लगा दी है.












Click it and Unblock the Notifications