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केबल टीवी कानून में प्रस्तावित संशोधन पर विवाद, प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग

By Staff
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    प्रस्तावित संशोधन केगंभीर निहितार्थो पर मंगलवार को चर्चा के बाद संपादकों ने कहा कि यह मीडिया को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में लाने का प्रयास है। ऐसे में संपादक प्रधानमंत्री से मिलकर उनसे इस मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध करेंगे।

    चैनल संपादकों ने एकमत से कहा कि सरकार के पास अभी भी सक्षम कानून हैं, जिनके आधार पर वह लाइसेंस समझौते का उल्लंघन करने वाले चैनलों के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम है। इसके बावजूद सरकार ऐसे संशोधन का प्रस्ताव आगे बढ़ा रही है जिससे मीडिया को उसके कर्तव्यों का पालन करने से रोका जा सकेगा।

    केबल टेलीविजन नेटवर्क (नियामक) कानून में प्रस्तावित संशोधन के बाद पुलिस आयुक्त के अलावा जिलाधिकारी और उपजिलाधिकारी के पास यह अधिकार होगा कि वह किसी भी चैनल के लाइव प्रसारण पर रोक लगाने के साथ संबंधित चैनल के प्रसारण उपकरणों को जब्त कर ले।

    प्रस्तावित संशोधन का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसमें 'राष्ट्रीय हित' से संबंध स्थिति में फुटेज और विजुअल को एक नोडल एजेंसी के माध्यम से मुहैया कराने की बात कही गई है। इसका मतलब यह हुआ कि टेलीविजन चैनल सांप्रदायिक दंगे और यहां तक कि राजस्थान में हुए गुर्जर आंदोलनों को भी लाइव कवर नहीं कर सकेंगे।

    प्रस्तावित संशोधन में अधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए यह तय करेंगे कि फुटेज का पुनप्र्रसारण जरूरी है या नहीं। अगर कोई भी सूचना अपुष्ट हो तो उसे रोकने का अधिकार उनके पास होगा। अधिकारियों के पास यह भी तय करने का अधिकार होगा कि रिपोर्टरों या पीड़ित का फोन इन या उनका साक्षात्कार राष्ट्रीय हित या लोक व्यवस्था के खिलाफ तो नहीं है।

    संपादकों ने इस मामले पर उनके दृष्टिकोण को पूरे देश में मिल रहे व्यापक समर्थन पर संतोष जाहिर किया। समाचार पत्रों की सबसे बड़ी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और अन्य संगठनों ने इस मुद्दे पर टेलीविजन चैनलों का समर्थन किया है।

    चैनल संपादकों ने दोहराया कि सरकार को इस मामले पर परिपक्व और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरुप रुख अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने जोर दिया कि प्रस्तावित संशोधन करीब-करीब आपातकाल की स्थिति में पहुंचा देगा। संपादकों ने कहा कि संशोधन प्रस्ताव पर सरकार को आगे नहीं बढ़ना चाहिए। यह दुनिया के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चौथे स्तंभ (मीडिया) पर संभवत: सबसे बड़ा हमला होगा।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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