उर्दू अख़बारों में 'अंतुले प्रसंग'

पर इस तरह का सवाल उठाने वाले ना अंतुले पहले हैं ना अकेले. उन्होंने जो कहा वो उर्दू के कुछ अख़बार मुंबई हमले के दिन से कह रहे हैं.
अंतुले ने कोई नाम नहीं लिया पर उर्दू अखबारों ने पूछा की करकरे की मौत के पीछे हिंदू चरमपंथी तो नहीं? इसराइल की गुप्तचर संस्था मोसाद तो नहीं? अमरीका की सीआईए तो नहीं? इस तरह के कई सवाल जिन्हें 'कॉन्सपिरेसी थ्योरी' यानि षडयंत्र का सिद्धांत कहा जा सकता है.
मैं षडयंत्र के सिद्धांतों को सामने रख कर काम करने की कोशिश कर रहा हूँ षडयंत्र नहीं कर रहा राष्ट्रीय सहारा उर्दू के संपादक, अज़ीज़ बरनी
| |
उर्दू मीडिया पर नज़र रखने वाले कई लोग इससे बेहद नाराज़ है. उनका कहना है कि ये मुसलमानों के डरों पर धंधा कर रहे हैं.
पर उर्दू अख़बारों के एक आम पाठक मोनाज़िर आलम कहते हैं, "दूसरे अख़बार मुसलमानों की बातों को नहीं उठा रहे हैं तो उर्दू के अख़बारों को उठाना ही होगा. किसी समुदाय की बात उठाना मैं ग़लत नहीं मानता".
दूसरे पाठक अफ़रोज़ आलम साहिल कहते हैं कि उर्दू अखबार दरअसल मुसलमानों में हिम्मत पैदा करते हैं.
वे कहते हैं, "जब हमें लगता है कि मुंबई हमलों या करकरे की मौत के पीछे मुसलमानों के अलावा भी कोई और हो सकता है तो हमें हौसला मिलता है."
आम मुसलमान पाठक की प्रतिक्रियाओं पर टिपण्णी करते हुए उर्दू के वरिष्ठ पत्रकार ख़ालिद रशीद कहते हैं, "जब भी कभी हालत हंगामी होते हैं तो पाठक भावुकता का शिकार होता है. भावुकता को भुनाने का सबसे अच्छा तरीका है कि उसमें उत्तेजना पैदा की जाए. कई उर्दू के अख़बार ये बहुत अच्छी तरह से कर रहे हैं और उन्हें इसका लाभ मिल भी रहा है."
'मीडिया ट्रायल'
मुंबई से छपने वाले उर्दू के अख़बार उर्दू टाइम्स के दस साल तक संपादक रह चुके राशिद आगे कहते हैं कि षडयंत्र के सिद्धांतों को हवा देने वाले अख़बारों की वजह से उन अख़बारों पर भी व्यावसायिक दबाव पड़ रहा है जो ज़िम्मेदार पत्रकारिता कर रहे हैं.
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग में प्रोफ़ेसर मोहम्मद शाफे किदवई मुंबई में हुए हमलों और उसके बाद उर्दू अख़बारों में इसके कवरेज़ पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कहते हैं, "हैदराबाद से छपने वाला सिआसत और मुंबई से छपने वाले इंक़लाब अख़बारों ने बहुत ही संतुलित ढंग से काम किया."
हैदराबाद के दूसरे उर्दू अखबार मुंसिफ़ या उत्तर भारत में कई जगहों से छपने वाले राष्ट्रीय सहारा उर्दू के बारे में उनकी राय इसके उलट है.
वे कहते हैं, "राष्ट्रीय सहारा उर्दू का रवैया मुझे सकारात्मक नहीं लगता. वो पहले पेज पर लगातार लिख रहे हैं जो ना संपादकीय है ना ख़बर. वो अपने तरीके से जांच भी कर रहे हैं और मीडिया ट्रायल भी कर रहे हैं. न उन्होंने वस्तुनिष्ठता का ध्यान रखा न निष्पक्षता का, इस तरह उर्दू में पहले कभी नहीं हुआ था. "
हिन्दुस्तान के कई शहरों से निकलने वाले राष्ट्रीय सहारा उर्दू ने सबसे पहले और सबसे तीखे और सबसे ज्यादा सवाल उठाए. इन सवालों के बाद ये अख़बार उर्दू पढ़ने वालों के बीच में बहुत ज्यादा चर्चित हुआ और सर्कुलेशन तेज़ी से बढ़ा.
जब भी कभी हालत हंगामी होते हैं तो पाठक भावुकता का शिकार होता है. भावुकता को भुनाने का सबसे अच्छा तरीका है कि उसमें उत्तेजना पैदा की जाए. कई उर्दू के अख़बार ये बहुत अच्छी तरह से कर रहे हैं और उन्हें इसका लाभ मिल भी रहा है खालिद राशिद
| |
इस अख़बार के संपादक अज़ीज़ बरनी षडयंत्र के सिद्धांतों को हवा देने का आरोप ख़ारिज कर दिया. बरनी कहते हैं, "मैं षडयंत्र के सिद्धांतों को सामने रख कर काम करने की कोशिश कर रहा हूँ षडयंत्र नहीं कर रहा."
बरनी जोर देते हुए कहते हैं कि रास्ता सुझाने के लिए सबसे ज्यादा ज़रूरी है कि जिस रास्ते से आप आए हो उसको भी परखें तभी आगे का रास्ता तय करा जा सकता है.
बरनी कहते हैं, "हाँ अगर कुछ लोगों को लगता है कि उनके दाग़दार दामन सबके सामने आ जाएँगें या कुछ लोग हीनभावना का शिकार हैं तो ये उनकी समस्या है."
अपनी लेखनी से दूसरे अख़बारों के ऊपर उनकी तरह से लिखने का दबाव बनाने के बारे में बरनी का कहना है कि वो तो महज़ सच सामने रख रहे हैं इससे अगर दूसरे अखबार दबाव महसूस करते हैं तो उन्हें ख़ुद से सवाल करना चाहिए.
एक बात जो सबने कहीं वो ये कि हालत अगर ऐसे हैं तो इसकी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बाकी मीडिया पर है जो एक लंबे समय से मुसलमानों की दिलों दिमाग में छाई बातों को ज़बान नहीं दे पा रहे.












Click it and Unblock the Notifications