नई अर्थव्यवस्था में त्योहारों पर हावी हुआ काम
नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। देश की नई अर्थव्यवस्था का प्रभाव पर्व-त्योहारों पर साफ तौर पर दिख रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में कार्यरत युवा काम के दबाव में त्योहारों के मौके पर भी अपने गांव का रुख नहीं कर पाते। अब माता-पिता को ही बच्चों के पास आना पड़ता है।
चितरंजन पार्क के एक दुर्गा पूजा पंडाल में पारंपरिक रस्म अदायगी कर रहीं बिहार के पटना जिले की शीला सिन्हा ने बताया कि उनका बेटा निजी क्षेत्र के एक बैंक का कर्मचारी है। अत्यधिक व्यस्तता की वजह से उसका घर जाना संभव नहीं था, इसलिए वह पति के साथ बेटे के पास यहां आ गई हैं।
उड़ीसा के संबलपुल जिले के विश्वजीत मिश्र ने बताया, "मेरी इच्छा थी कि दुर्गा पूजा के मौके पर घर जाऊं लेकिन जब संभव नहीं हो पाया तो मैंने मां-पिताजी को ही यहां बुला लिया है।" विश्वजीत के पिता ने कहा, "बेटे और बहू के साथ त्योहार मनाने का अपना आनंद है लेकिन इस व्यस्त महानगर में अपने गांव की कमी महसूस हो रही है।"
नई दिल्ली में निजी क्षेत्र की एक कंपनी में काम करने वाले बिहार के सहरसा जिले के अजय चौधरी ने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक त्योहारों के मौके पर गांव में लोगों की उपस्थिति अनिवार्य रहा करती थी। अब स्थितियां बदल गई हैं और यह बंधन भी ढीला पड़ गया है।
अजय की पत्नी निधि ने बताया, "त्योहारों के दिन घर से दूर होने पर पूरा मजा किरकिरा हो जाता है। खैर! यहां भी देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की गई हैं और पंडाल बनाए गए हैं। नवमी के दिन भी दुर्गा माता के दर्शन के लिए आऊंगी।"
राजधानी में दशहरा के अवसर पर रामलीला और रावण दहण को अधिक महत्व दिया जाता है लेकिन पूर्वी संस्कृति का प्रभाव भी यहां जोरों पर है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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