जीवन की 'डोर' बनी प्लास्टिक की डोर

आज यही काम इस गांव के लोगों के लिए अर्थ उपार्जन का मुख्य धंधा बन गया है। गौरतलब है कि इसके लिए यहां के लोगों ने न कोई प्रशिक्षण लिया है, और न ही इन्हें अभी तक कोई आर्थिक सहायता ही मिली है। यहां के ग्रामीण प्लास्टिक के बोरों की कतरन जो लोगों द्वारा फेंक दिए जाते हैं, उन्हीं कतरनों को मजबूती से बांटकर रस्सियां बनाते हैं। सबसे मजेदार बात है कि इन रस्सियों को बनाने में ये ग्रामीण औजार के नाम पर सिर्फ साइकिल के एक पहिये को मशीन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

गांव के 55 वर्षीय मिराज अंसारी जो रस्सी बनाने के धंधे में करीब दो दशकों से जुड़े हैं, ने आईएएनएस को बताया कि इसी धंधे की कमाई से उन्होंने अपनी पांच बेटियों की शादी की। उन्होंने बताया कि उनके पास इतनी जमीन नहीं थी कि वे अपने पूरे परिवार का वर्ष भर पेट पाल सकें। विवश हो उन्होंने इस धंधे को अपनाया और आज यही धंधा गांव के लोगों के लिए मुख्य रोजगार बन गया है।

इसी धंधे से जुड़े जहीर अंसारी बताते हैं कि आज इस गांव के दर्जनों परिवार इस काम के कारण समृद्ध हो गए हैं। उन्होंने हर्ष के साथ कहा कि आज गांव में कोई बेरोजगार नहीं।

उधर, विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक व अरू गांव निवासी रमेश उरांव का मानना है कि इन ग्रामीणों को अगर सरकार सहायता दे तो इस रोजगार को और बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस धंधे से जुड़े कई लोगों ने बैंक में ऋण के लिए आवेदन दे रखा है परंतु उन्हें अब तक ऋण उपलब्ध नहीं हो पाया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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