आभूषण डिजाइनिंग में भी तलाशे जा सकते हैं रोजगार के अवसर

नई दिल्ली, 4 जून (आईएएनएस)। हीरे-जवाहारात को नारी सर्वाधिक महत्व देती रही हैं। ये उसे विपत्तिकाल में संबल भी प्रदान करते रहे हैं। युगों-युगों से नारी जगत के हृदय में आभूषणों के प्रति लालसा रही है। हीरे-जड़ित बालियों या रूबी के पेंडेंट के बिना नारी का श्रृंगार अधूरा रह जाता है। यही नहीं, पुरुष भी हीरे-जवाहरात के प्रति समान रूप से आकर्षित हो रहे हैं।

भारतीय मानस हमेशा आभूषणों के प्रति सम्मोहित रहा है। इसके पीछे यह तथ्य भी है कि भारतीयों के पास आभूषण और कीमती धातुओं का भंडार है। लोग आभूषणों को फैशन या प्रतिष्ठा का प्रतीक ही नहीं मानते, बल्कि यह निवेश का भी साधन है। वस्तुत: भारतीय उद्योग का आभूषणों में कुल 43 प्रतिशत हिस्सा है। इसके साथ ही रत्नों का प्रतिवर्ष लगभग 70 हजार करोड़ रुपये का पूरे विश्व में निर्यात किया जाता है।

यद्यपि आभूषणों का डिजाइन तैयार करना बहुत पुराना व्यवसाय है, तथापि अधिकांशत: हमारे पूर्वजों से लेकर आज तक फैशन को बदलते वक्त के साथ जोड़कर देखने के कारण आज का यह डिजाइन का कार्य परंपरा से हटकर है। हमारे जीवन के दैनिक व्यवहार में भी फैशन का स्थान रहा है। इसमें भी डिजाइनिंग की सभी शाखाओं में आभूषण प्रमुख रूप से आकर्षण का केंद्र रहा है।

इसे व्यापक स्तर पर स्वीकृति मिल रही है। फैशन की दुनिया में इसकी प्रधानता रही है और यह नित नए फैशन का रूप लेता जा रहा है। आज आभूषण की डिजाइनिंग के लिए अनुभव और नवोन्मेष की इच्छा की जरूरत है, ताकि ग्राहक की बदलती रुचियों और अपेक्षाओं के अनुसार नए डिजाइन तैयार किये जा सकें।

इस क्षेत्र में सफलता पाने के लिए व्यक्ति को फैशन में आनेवाले परिवर्तनों तथा रुझानों के अनुरूप बनना होगा तथा उसे बाजार की आवश्यकताओं को आंकने में कुशलता प्राप्त करनी होगी। रंग की सौंदर्यानुभूति तथा लावण्य का बोध होना जरूरी है। जेवरात के डिजाइन से संबंधित प्रक्रिया डिजाइनर से आरंभ होती है। पुन: डिजाइन मॉडल मेकर को दे दिया जाता है, ताकि हाथ से प्रोटोटाइप पीस तैयार किए जा सके। इससे अगली अवस्था पर व्यापक स्तर पर उत्पादन की दृष्टि से सांचा बनाया जाता है। कुछ मामलों में जब डिजाइन में कीमती पत्थर लगाने होते हैं जो कि डिजाइन का हिस्सा होते हैं, उस समय मॉडल मेकर को स्टोन सेटिंग की प्रक्रिया ध्यान में रखनी होगी।

यद्यपि डिजाइनिंग के प्रति मूल वृत्ति होने पर व्यक्ति इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर सकता है लेकिन विशेषज्ञता पर अधिकाधिक बल दिए जाने के कारण पाठ्यक्रम में शामिल होना अनिवार्य है। ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित ए. गांगुली और एस. भूषण की पुस्तक अपना कैरियर स्वयं चुनें के अनुसार रत्न और आभूषण की डिजाइनिंग में अधिकांशत: पाठ्यक्रम अल्पकालीन अवधि के कार्यक्रम हैं। बाहरवीं कक्षा के बाद इन पाठ्यक्रमों में शामिल हुआ जा सकता है।

ये पाठ्यक्रम डिप्लोमा स्तर के होते हैं व इनकी अवधि अलग-अलग होती है। ऐसे अधिकांश पाठ्यक्रम 'गौण सामग्री डिजाइनिंग पाठ्यक्रम' के हिस्से हैं तथा इसमें जेवरात की विशेषज्ञता शामिल है। अन्य संबद्ध पाठ्यक्रमों में व्यक्ति जेवरात डिजाइनिंग और प्रौद्योगिकी के अतिरिक्त रत्न-विज्ञान, प्रौद्योगिकी, मोम की मॉडलिंग तथा सांचे बनाना, फिनिशिंग, पॉलिश करने तथा मरम्मत, इलेक्ट्रो प्लेटिंग एवं इलेक्ट्रो फोर्मिग, मीनाकारी, पत्थर की सेटिंग, परख और परिष्करण, बाजार अनुसंधान, प्रस्तुतीकरण और बिक्री संबंधी बोध, व्यवसाय अध्ययन और निर्यात प्रलेखन तथा फैक्टरी और स्टोर की निगरानी में भी प्रशिक्षण ले सकता है।

कुल मिलाकर 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर प्रवेश दिया जाता है। कक्षागत अध्ययन के साथ कार्यशालाओं में भी विद्यार्थियों को ले जाया जाता है, ताकि उन्हें विविध प्रक्रियाओं एवं जेवरात बनाने तथा डिजाइनिंग में शामिल कार्यो की प्रत्यक्ष जानकारी मिल सके।

पाठ्यक्रम के सफल समापन पर विद्यार्थी किसी भी प्रतिष्ठित जेवरात हाउस में प्रशिक्षु के रूप में कार्य कर सकते हैं। यह अनुभव अधिक बड़ी और समृद्ध स्थापनाओं में आगे बढ़ने के लिए स्पिं्रग बोर्ड का कार्य करता है। प्रशिक्षु स्तर पर व्यक्ति को साढ़े तीन हजार रुपए तक भुगतान किया जाता है लेकिन एक बार पैर जम जाने पर फिर आय की कोई सीमा नहीं रहती।

इस कार्य में धातु कर्म तथा रत्न-विज्ञान के बारे में आधारभूत जानकारी होनी चाहिए। साथ ही वर्तमान शैली, विशद योजना और नए डिजाइनों की मार्केटिंग में गहन दृष्टि होनी चाहिए। पैटर्न पर विचार करने के बाद डिजाइनर प्राय: कागज पर विस्तृत स्केच बनाता है, नमूने के तौर पर मॉडल तैयार करता है और फिर ग्राहकों को खोजता है। हालांकि सोना, चांदी, हीरे, मोती और अन्य कीमती तथा अर्ध-बहुमूल्य पत्थर जेवरात के सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम रहे हैं लेकिन आजकल डिजाइनर लकड़ी, पीतल, तांबा, शैल, कांच और यहां तक कि सूखे फूलों एवं पेपियर मैश जैसी सामग्री का भी प्रयोग कर रहे हैं। जेवरात डिजाइनर के रूप में आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप पारंपरिक वस्तुओं से लेकर समकालीन भारी-भरकम तथा हल्के जेवरों तक व्यापक रेंज में शामिल समस्त जेवरात तैयार कर सकें।

विश्व के किसी भी कोने में नौकरी का व्यापक क्षेत्र है। कुछ उद्यमी व्यक्ति अपने कारोबार खोलने का भी साहस रखते हैं। धीरे-धीरे वे जेवरात की अलग ब्रांड या लाइनें विकसित कर लेते हैं। तथापि किसी भी कारोबार को आरंभ करने से पूर्व आपको यह ध्यान रखना है कि जेवरात डिजाइनिंग में भारी मात्रा में निवेश की आवश्यकता रहती है। भारत के परंपरागत सुनार तथा डिजाइनर का जोर हमेशा निर्यात बाजार पर रहा है।

आभूषण डिजाइनिंग के क्षेत्र में युवा पीढ़ी के लिए अनेक अवसर हैं, ताकि घरेलू बाजार विशेषत: स्वतंत्र रूप से आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके। डि-बीयर्स, एंचेंट तथा स्वारोव्स्की जैसे अंतर्राष्ट्रीय नाम जेवरात के जाने पहचाने ब्रांड बन चुके हैं। युवा वर्ग और सर्जनात्मक रुचि के लोगों में यह क्षेत्र लोकप्रिय होता जा रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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