लुप्त हो रही है परंपरागत गोदना का प्रचलन
ढाई-तीन दशक पूर्व तक हर एक महिला गोदना गोदवाना आवश्यक समझती थी। कई महिलाएं हाथ एवं शरीर के अन्य अंगों पर गोदना गोदवाती थीं, तो अधिकांश महिलाएं अपने पति का नाम ही गुदवाकर अपने सच्चे अर्धागनी होने का सबूत पेश करती थी लेकिन आज गोदना का रूप टैटू ने ले लिया है।
झारखंड के पलामू जिले की एक वयोवृद्ध आदिवासी महिला सुनैना देवी का कहना है कि हर एक सौभाग्यवती महिला को गोदनारूपी आभूषण ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने बताया कि हमलोगों के समाज में औरतें और पुरुष अपने चेहरे, माथे और हाथों में गोदना गुदवाते थे।
गोदना गोदने की कला में माहिर गोदहारीन सीता देवी का कहना है कि गोदना एक विशेष प्रकार के स्याही से गोदे जाते हैं। इस स्याही को बनाने के लिए पहले काले तिलों को अच्छी तरह भुना जाता है और फिर उसे लौंदा बनाकर जलाया जाता है। जलने के बाद प्राप्त स्याही जमा कर ली जाती है और इस स्याही से गोदहारिन एक विशेष प्रकार की सुई से जिस्मों पर मनचाही आकृति, नाम और चिन्ह गोदती है।
रांची जिले के एक विद्यालय में शिक्षिका के रूप में कार्यरत श्रुति देवी का कहना है कि यह प्रचलन काफी पुराना है। उनका मानना है कि मिश्र में ईसा से 1300 वर्ष पूर्व गोदना गुदवाने की प्रथा थी। आज आधुनिक समाज में यह प्रथा जरूर कम हो गई है लेकिन आज भी ग्रामीण परिवेश की महिलाएं गोदनारूपी आभूषण ग्रहण करना चाहती हैं।
बिहार के औरंगाबाद जिले के बेलवां पंचायत की मुखिया रीता देवी का कहना है कि गोदना गोदवाने की परंपरा हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई है। हालांकि उन्होंने माना की आज गोदना गोदने वाली गोदहारिनों की संख्या कम हो गई है। उन्होंने कहा कि गोदना गोदवाने की कोई उम्र सीमा नहीं है। पांच-छह वर्ष की बच्चियों से लेकर वृद्ध औरतें भी गोदना गुदवाती हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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