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रोजगारपरक है अग्नि-शमन की पढ़ाई

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    नई दिल्ली, 3 जून (आईएएनएस)। आज की दुनिया में आग लगने के जोखिम का अर्थ बढ़ते शहरीकरण तथा औद्योगिक कार्यो में वृद्धि के साथ-साथ अप्रत्याशित विनाश है। मकानों और कार्यालयों में विद्युत उपकरणों यानी ऑटोमेशन, हीटिंग एवं कूलिंग प्रणाली का इस्तेमाल हो रहा है। बम विस्फोट जैसे आतंकवादी वारदातों तथा ज्वलनशील पदार्थो के प्रति लापरवाही बरतने के कारण आधुनिक सभ्यता अत्यधिक खतरों से घिर गई है।

    भारत में आग लगने के विषय राज्य सूची में शामिल हैं तथा राज्य और संघ शासित प्रदेश अग्नि-शमन सेवाओं पर नियंत्रण रखते हैं। सभी राज्य में अग्नि-शमन विभाग है जो अग्नि सुरक्षा के उपायों पर नजर रखता है। गृह मंत्रालय राज्य व संघ शासित क्षेत्रों तथा अग्नि-बचाव, अग्नि-निवारण एवं विधान के क्षेत्र में केंद्रीय मंत्रालयों को तकनीकी सलाह देता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दो हजार से अधिक फायर स्टेशनों पर लगभग 66 हजार कर्मचारी कार्यरत हैं और साढ़े छह हजार उपकरण वाहकों का बेड़ा शामिल है।

    दमकल विभाग के इंजीनियर(फायर इंजीनियर) आग लगने के कारणों का पता लगाने और अग्नि-निवारण की विधियों का निर्धारण करने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ये अग्नि-रोधकों के संबंध में अनुसंधान एवं परीक्षण कार्य करते हैं और सामग्री की अग्नि-सुरक्षा एवं मुक्तियों पर शोध और परीक्षण करते हैं। ये ज्वलनशील तथा खतरनाक पदार्थो के भंडारण की सुरक्षित विधियां सुझाते हैं।

    फायर इंजीनियर अग्नि खतरों का आकलन करने के लिए गणितीय सिद्धांतों का इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद अग्नि-सुरक्षा की पद्धतियों के लिए वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रयोग करते हैं। आग के भयानक रूप धारण कर लेने एवं फैलने की घटनाओं के निवारण के लिए फायर इंजीनियर प्रबंधन तकनीकों व इंजीनियर का कार्य अधिक जोखिम भरा है। प्रशासनिक और अनुसंधान क्षेत्रों में टेबल-वर्क(कार्यालयी काम-काज) ही अधिक होता है।

    सरकारी एवं गैर सरकारी क्षेत्र के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार यदि विनिर्दिष्ट संख्या से अधिक व्यक्ति काम करते हैं तो कंपनी को फायर अधिकारी की नियुक्ति करनी पड़ेगी, जो कार्य कर रहे अग्नि-शमन कर्मचारियों का पर्यवेक्षण करेगा। इसके साथ-साथ अग्नि-शमन विभाग से संबंधित नियमों-विनियमों को लागू करेगा और आग बुझाने वाले उपकरणों का अनुरक्षण सुनिश्चित करेगा।

    फायर इंजीनियर उन सभी सुरक्षा क्षेत्र में कार्य करता है जहां आग लगने की आशंका रहती है। जैसे सरकारी अग्नि-शमन सेवाओं, वास्तुशिल्प एवं बिल्डिंग डिजाइन, बीमा आकलन, परियोजना प्रबंधन, वायुयान उद्योग, रिफाइनरी, औद्योगिक प्रक्रमण आदि। कार्यालयों या आवासीय अहातों के मालिक भी फायर इंजीनियर की सेवाएं लेते हैं ताकि उनके सर्वोत्तम अंश की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

    संरक्षात्मक भूमिका में सुरक्षा संबंधी विविध जांच कार्य, उपकरणों को अद्यतन बनाए रखना, अनुसूचित कार्यक्रमों का संचालन एवं आकस्मिक फायर ड्रिल शामिल है। फायर इंजीनियर बीमा कंपनी के सर्वेक्षक के रूप में बीमित पार्टी द्वारा झेली गई क्षति के आकलन, आग लगने के कारणों की तहकीकात, सुरक्षायंत्रों एवं अलार्म प्रणाली की प्रभावोत्पादकता देखने संबंधी कार्य करते हैं।

    फिलहाल देश में प्रभावी अग्नि-शमन प्रबंधन प्रणाली तैयार करने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि अग्नि-शमन प्रबंधन एवं आपदा प्रबंधन प्रणाली के इस आंतरिक भाग की दिशा में बहुत कुछ नहीं किया गया है। शहरीकरण के साथ-साथ आग लगने के खतरे भी समान रूप से बढ़े हैं। ऐसे में प्रभावी अग्नि प्रबंधन प्रणाली तैयार करने के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।

    इस क्षेत्र में शैक्षिक योग्यता रसायनशास्त्र, भौतिकी या गणित अथवा वैकल्पिक रूप में दोनों विषयों के साथ 'बीएस-सी' की उपाधि होनी चाहिए। इसमें अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा के माध्यम से चयन किया जाता है। नई दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता तथा नागपुर में लिखित परीक्षा आयोजित की जाती है। इसके बाद साक्षात्कार लिया जाता है। लिखित परीक्षा में भौतिकी और रसायनशास्त्र में एक-एक वस्तुनिष्ठ पत्र होता है। इस परीक्षा का स्तर 'बीएस-सी' के स्तर का होता है। महाविद्यालयों की चिकित्सा अधिकारी चिकित्सकिय जांच करती है। अनुपयुक्त घोषित उम्मीदवारों को इस पाठ्यक्रम में दाखिला नहीं दिया जाता है। यह पाठ्यक्रम राष्ट्रीय अग्नि-शमन सेवा महाविद्यालय (गृह मंत्रालय), नागपुर द्वारा चलाया जाता है।

    (यह लेख ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित ए. गांगुली और एस. भूषण की पुस्तक 'अपना कैरियर स्वयं चुनें' से लिया गया है।)

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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