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गांवों में पोस्टर जगाएंगे एड्स जागरूकता की अलख

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    नई दिल्ली, 1 जून (आईएएनएस)। एचआईवी-एड्स के बारे में जागरूकता फैलाने वाले संदेश अब ज्यादा आकर्षक और लोकप्रिय हो रहे हैं।

    नई दिल्ली, 1 जून (आईएएनएस)। एचआईवी-एड्स के बारे में जागरूकता फैलाने वाले संदेश अब ज्यादा आकर्षक और लोकप्रिय हो रहे हैं।

    नंदलाबोस की पटुआ शैली की पेंटिंग पर आधारित एक खुशहाल दंपति को दर्शाता कंडोम के इस्तेमाल के लिये प्रेरित करने वाला पोस्टर, प्रवासी मजदूरों को असुरक्षित यौन संबंधों से आगाह करने वाली संथाली भाषा में रचित कहानी आदि ऐसे ही माध्यम हैं जो अब इस जानलेवा बीमारी के प्रति लोगों को आगाह करने के लिए अपनाए जा रहे हैं।

    बांग्ला भाषा का एक ऐसा पोस्टर भी है, जो दिखने में बिल्कुल कंठा-स्टिच कढ़ाई जैसा है जो बहुत असरदार ढंग से अपने साथी के प्रति वफादार रहने की प्रेरणा तो देता ही है साथ ही सीरिंज के दोबारा इस्तेमाल से होने वाले खतरों के प्रति आगाह भी करता है।

    ये पोस्टर और सचित्र पुस्तकें राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के तहत राज्य संसाधन केंद्रों (एसआरसी) ने तैयार करवाए हैं, जो ग्रामीण इलाकों में 15 से 35 आयुवर्ग के नवसाक्षरों के लिए कक्षाएं आयोजित करता है।

    यूनेस्को के शंकर चौधरी ने आईएएनएस को बताया, "पोस्टर और पढ़ने में आसान पुस्तिकाएं- लोगों को ध्यान आकृष्ट करने और उन्हें एड्स के बारे में चर्चा करने के लिये प्रेरित करने जैसे दोनों ही तरीकों में मददगार साबित होती हैं। इनमें महज असुरक्षित सेक्स की वजह से ही एड्स से ग्रसित होने का जिक्र नहीं होता, बल्कि लोगों को बताया जाता है कि सीरिंज या सुई के बार-बार इस्तेमाल जैसे अन्य कारणों की वजह से भी एड्स का शिंकजा उन पर कस सकता है।"

    संयुक्त राष्ट्र संस्था एचआईवी-एड्स के बारे में जागरूकता फैलाने के लिये साक्षरता कक्षाओं के तहत सरकार के साथ मिलकर काम कर रही है। संस्था ने बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में छह एसआरसी में किताबें और पोस्टर भी प्रायोजित किए हैं। समझा जाता है कि भारत में एचआईवी-एड्स के मरीजों की तादाद 25 लाख है।

    इन पुस्तिकाओं को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच बनाने के लिए इन्हें स्थानीय भाषाओं में तैयार किया गया है। अब इन्हें स्थानीय बोलियों में भी तैयार करवाया जा रहा है।

    पटना एसआरसी की पुस्तकें संथाली में जबकि पश्चिम बंगाल एसआरसी की पुस्तकें और पोस्टर बांग्ला भाषा में हैं। बिहार के किशनगंज में उर्दू भाषा में पुस्तिकाएं छापी गई हैं जहां इनके पाठकों की खासी तादाद है। इन किताबों में न सिर्फ हिंदू बल्कि मुस्लिम और ईसाई किरदारों के नाम भी हैं।

    चौधरी ने बताया कि इन पुस्तकों को असर बहुत अच्छा रहा है और एसआरसी में बहुत सी महिलाओं ने बताया कि उन्होंने इन्हें दो - तीन बार पढ़ा है और वे ऐसी और भी किताबें पढ़ना चाहती हैं। इतना ही नहीं, इन पुस्तिकओं की बदौलत उन्हें इस विषय पर चर्चा करने के लिये प्रेरणा भी मिलती है।

    चौधरी ने कहा कि प्रवास एक बड़ी समस्या है। पुरूष काम के लिये गांव से बाहर जाते हैं, जहां सावधानी नहीं बरतने पर उनके संक्रमित होने की आशंका रहती है।

    देश में ऐसे 28 एसआरसी हैं और यूनेस्को इन सभी को सहयोग दे रहा है। यूनेस्को ने इन सभी में प्रशिक्षण सत्र भी आयोजित किए हैं जिनके नतीजे सकारात्मक रहे हैं।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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