भरोसे का भरोसा रंग लाया!
भोपाल, 21 मई (आईएएनएस)। कहते हैं मेहनत और प्रयास कभी बेकार नहीं जाती। यह जुमला बुंदेलखंड के टीकमगढ़ में सच साबित हुई है। यहां भरोसे यादव ने पांच दशक तक पानी के लिए संघर्ष किया और बुढ़ापे में उसे सफलता मिली।
टीकमगढ़ से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित डूड़ा गांव के किसान भरोसे यादव ने अपनी पूरी जवानी पानी के अभाव में गुजारी। 20 साल की उम्र में उन्होंने सिंचाई के लिए कुआं खोदने की योजना बनाई थी। उनकी पत्नी बिनियां बाई ने उनकी इस योजना में साथ दिया। लेकिन किस्मत धोखा दे गई। कुआं खोदा गया लेकिन पानी नहीं निकला।
भरोसे और बिनियां इस असफलता से निराश नहीं हुए। उन्होंने तय किया कि वे पानी की व्यवस्था करके ही रहेंगे। इसके लिए उन्होंने दूसरी बार, फिर तीसरी बार कुएं खोदे लेकिन सफलता नहीं मिली। उनकी असफलता का सिलसिला पांचवी बार भी जारी रहा।
पति पत्नी अपने जीवन के सात दशक पार कर चुके हैं। बच्चे बड़े हो गए हैं। घर में तीसरी पीढ़ी भी दस्तक दे चुकी है। फिर भी दोनों बुजुर्गे की इच्छा एक ऐसे कुएं की बनी रही जिससे पानी का स्थाई जुगाड़ हो सके।
हाल ही में इस गांव को इंदिरा गांधी गरीबी हटाओ योजना (डीपीआईपी) में शामिल किया गया। इस योजना ने इस बुजुर्ग दंपति की इच्छा पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डीपीआईपी के को-ऑर्डिनेटर अशोक जैन कहते हैं कि उन्हें जब भरोसे के संघर्ष की कहानी का पता चला तब उन्होंने इसके लिए मदद की व्यवस्था की। सरकारी योजना की कोशिश रंग लाई और भरोसे के खेत में खोदे गए कुएं में पानी निकल आया।
भरोसे और बिनियां बाई कहती हैं कि पानी निकल आने और कुआं बन जाने से उन्हें उम्मीद है कि आने वाला कल उनके जीवन को बदल देगा, क्योंकि उनका पांच दशक पुराना सपना अब हकीकत बन गया गया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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