मल्टीप्लेक्स की चकाचौंध में खो गया गरीबों के मनोरंजन का साधन

वाराणसी, 18 मई (आईएएनएस)। मल्टीप्लेक्स सिनेमा हालों की चकाचौंध ने भले ही दशर्कों के लिए एक नया एहसास दिया हो लेकिन इसकी चकाचौंध में पूर्वाचल के एकल सिनेमाहालों की स्थिति दिन पर दिन खराब ही होती जा रही है। सरकार की नीति की वजह से पूर्वाचल के 50 प्रतिशत से ज्यादा सिनेमाहल बंद हो चुके हैं तो वहीं गरीबों को सस्ता और सुलभ मनोरंजन उपलब्ध कराने का प्रदेश सरकार का संकल्प भी अब बेमानी लगने लगा है।

एक तरफ सरकार मल्टीप्लेक्स सिनेमाहालों को मनोरंजन कर में छूट दे रही है तो दूसरी तरफ सिंगल स्क्रीन के सिनेमाहालों पर 60 प्रतिशत मल्टीप्लेक्स टैक्स लगा कर उन्हें हतोत्साहित भी कर रही है।

प्रदेश सरकार की इस दोहरी नीति में बालीवुड के निर्माताओं ने कोढ़ में खाज का काम किया है क्योंकि आजकल ऐसी फिल्में बन रही हैं, जो सिर्फ मल्टीप्लेक्स के दर्शकों को ही पसंद आयेंगी। जैसे रेस, भूतनाथ, ओम शान्ति ओम, ये सब ऐसी फिल्में हैं जो न तो सामाजिक सरोकार से जुड़ी हैं और न ही मध्यम वर्गीय परिवार की सोच के दायरे में आती हैं, जबकि सिनेमाहालों में फिल्म देखने वाले अधिकांशत: मध्यम वर्गीय ही होते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि अंतिम सांसें गिन रहे पूर्वाचल के एकल सिनेमा हाल भोजपुरी सिनेमा के सहारे ही जिंदा है।

उत्तर प्रदेश का सिनेमा इक्जिबिटर फेडरेशन इस बात से बेहद चिंतित है कि जिस तरह से छोटे स्टेशन के लिए आजकल फिल्मों की किल्लत महसूस की जा रही है अगर सरकार इस पर ध्यान नहीं देगी तो आने वाले दिनों में गरीबों को सस्ता मनोरंजन उपलब्ध कराने की सरकार की प्रतिबद्धता को ठेस भी पहुंच सकती है। उत्तर प्रदेश सिनेमा इक्जिबिटर फेडरेशन के महामंत्री आलोक दूबे ने बताया कि पूर्वाचल के अधिकांश सिनेमाहाल बंद हो चुके हैं और जो बचे हैं वे बंद होने के कगार पर हैं।

दुबे ने बताया की वाराणसी में कभी 27 सिनेमाहाल हुआ करते थे, लेकिन अब 12 ही रह गए हैं, चंदौली जिले में 12 सिनेमा हाल थे लेकिन अब सिर्फ 4 ही रह गए हैं। इसी तरह मिर्जापुर में 13 में से 7 बंद हो चुके हैं, गाजीपुर में 4 हाल हुआ करते थे लेकिन अब सिर्फ एक ही हाल रह गया है। ऐसी ही हालत कमोवेश पूर्वाचल के सभी जिलों की है।

धुआंधार बंद हो रहे छोटे सिनेमाहाल के मुकाबले अगर देखा जाय तो पूरे पूर्वाचल में सिर्फ वाराणसी में ही मल्टीप्लेक्स हाल हैं जिसमें एक साथ छह सिनेमा लगाये जाते हैं जिसका टिकट दर 100 रुपये से लेकर 150 तक है जिसमें साधारण आदमी मनोरंजन के नाम पर इतना पैसा खर्च करने की स्थिति में नहीं होता है।

सिनेमा इक्जिबिटर फेडरेशन के उपाध्यक्ष ललित अग्रवाल जो एक सिनेमाहाल के मालिक भी हैं, दुखी स्वर में बताते हैं कि सरकार की यह आदत है कि जब किसी उद्योग का दम टूटने लगता है तो सरकार उसे जिलाने की कोशिश करने लगती है।

इसका उदाहरण सत्तर के दशक में बना चलचित्र निगम था जिसका उद्देश्य था कि इसके माध्यम से सरकार गरीबों को सस्ते दर पर मनोरंजन उपलब्ध कराने का उत्तरदायित्व पूरा करेगी। इसके लिए उस समय निगम ने पूरे प्रदेश में 43 सिनेमाहालों का निर्माण भी करवाया था लेकिन इनका भी वही हश्र हुआ जो अन्य सरकारी प्रयासों का होता है। चलचित्र निगम द्वारा बनाये गए सभी सिनेमाहाल अब बंद हो गए हैं।

सरकार गरीबों को सस्ते दर पर मनोरंजन तो उपलब्ध नहीं करा पायी, ऊपर से मल्टीप्लेक्स को बढ़ावा देकर बचे हुए गरीबों के मनोरंजन के साधनों को हतोत्साहित भी कर रही है। गरीबों को सस्ते दर पर मनोरंजन उपलब्ध कराने के सरकार के दायित्व निभाने के सवाल पर अग्रवाल ने कहा कि सरकारी नीतियों में ही विरोधाभास है तो गरीबों को सस्ता मनोरंजन कहां से मिलेगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

**

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+