भैया, ये बिजली के तार उतरवा ही दो, इन्होंने तो बदनाम कर दिया..
वो जो हम तारों में उलझ गए थे, उस पर लोग मजाक बना रहे हैं। हम सोच रहे हैं कि ये आपका विकास कहीं हमें बस से नीचे ना गिरा दे...
नई दिल्ली। राहुल और अखिलेश हाथ में हाथ डालकर यूपी के चुनाव में उतर आए हैं। नारा भी लगा दिया 'यूपी को ये साथ पसंद है'। अब दोनों साथ में बस पर चढ़कर निकले तो नारेबाजी भी खूब हुई और अखिलेश-राहुल पर फूल भी फेंके गए।

इस सबके बावजूद राहुल का मूड खराब हो गया। दरअसल राहुल तो सोच रहे हैं कि अखिलेश के रथ पर सवार होकर पार चले जाएंगे लेकिन वो बस पर चढ़े तो तारों में उलझ गए। अब सोशल मीडिया और अखबारों में मजाक उड़ा तो राहुल इस बात को लेकर अखिलेश तक पहुंच गए।
अखिलेश- चुनाव में सब ठीक हो रहा है.. फिर क्या हुआ जो मुंह लटकाए आ रहे हो राहुल बाबा?
राहुल- क्या बताएं भैया.. हम यूपी में सालों पैदल चलकर थक गए थे और आप की साइकिल खूब चल रही है। इसी को देखते हुए तुम्हारी साइकिल पर बैठे थे लेकिन...
अखिलेश- लेकिन क्या....? साइकिल तो बढ़िया चल्लई है... तुम क्यों परेशान हो रहे हो?
राहुल- हम सीधी बात बता रहे हैं। वो जो हम बस पर सवार होकर प्रचार किए यूपी में... तो बस वही गड़बड़ हो गया है। वो जो हम तारों में उलझ गए थे, उस पर लोग मजाक बना रहे हैं। हम सोच रहे हैं कि ये आपका विकास कहीं हमें बस से नीचे ना गिरा दे...
अखिलेश- अरे घबराते बहुत हो... पांच साल में हमने बहुत कुछ किया, तो अब अगले पांच साल में कुछ और भी करेंगे....
राहुल- क्या करेंगे? आप आपको पांच साल में कम से कम तार तो ऊपर करवा दिए होत... बिजली तो जब आती, तब आती... कम से कम आज ये दिन तो ना देखना पड़ता...
अखिलेश - वाह राहुल जी.. मतलब.. आपको ये दिन हमारी वजह से देखने पड़ रहे हैं..??
राहुल- नहीं.. मेरा मतलब ये नहीं है कि ये दिन आपकी वजह से... आप तो हमारी पार्टी की हालत पर चले गए... मैं तो तारों में उलझने पर हो रही मजाक की बात कर रहा हूं.....
अखिलेश- वैसे मैं आपको बता दूं कि जो लोग मजाक बना रहे हैं, उनको जवाब देने का इंतजाम हमारी पीआर टीम कर रही है। अरे यार.. पांच साल में कुछ काम रह गए हैं, जो नहीं हो पाए लेकिन मैं कोई ठाली तो नहीं बैठा था ना पांच साल तक.. और ना ही विदेश में समंदर किनारे छुट्टियां बिता रहा था।
राहुल- हां, मैं समझ रहा हूं. नहीं कहूंगा कुछ भी... लेकिन ये बातों-बातों में छुट्टी पर जाने की बात ना किया कीजिए भाई.. बुरा लगता है।
अखिलेश- आपको बुरा लगता है तो ना कहेंगे.. लेकिन हम भी बहुत फंसे हुए थे, बहुत मेहनत करनी पड़ी है. वो कहते हैं ना, कुछ तो मजबूरियां रही होंगी..
राहुल- जनता को बताइए ना फिर आप कि क्या करते रहे पांच साल तक..
अखिलेश- आप मरवाएंगे.... अरे ये सबको बताने की बातें नहीं.. आप सुन ले.. पहला साल तो मेरा काम को समझने में और नेताजी को ये समझाने में बीत गया कि आप बेफिक्र रहिए मैं संभाल लूंगा। आपको क्या बताऊं राहुल भाई.. पहले दो-तीन साल तक तो शिवपाल चाचा, नेताजी, आजम चचा... कोई भी आकर सीधे मेरे दफ्तर में घुस जाता था। बस फिर.. पहले तीन-चार साल तो मैंने अपने विधायक सेट किए और आखिरी साल-डेढ़ में चाचा, अंकल, नेताजी.. सबको सेट कर दिया.... आसान मानते हैं ये सब????
राहुल - नहीं भैया, आसान नहीं है बिल्कुल भी... मेरी तो अपने पद के 'उपाध्यक्ष' में से 'उप' हटाने की हिम्मत नहीं हो रही बहुत दिन से कोशिश कर रहा हूं... ये तो भाई तू ही है कि पूरे के पूरे अध्यक्ष को हटा दिया... और वो भी 'पहलवान अध्यक्ष'.. मेरा 'अध्यक्ष' तो बीमार है, तब भी डर लगता है।
अखिलेश- तो फिर उलझे तारों में मत उलझो... मुझे देखो और भरोसा करो, पांच साल में इतना कुछ किया तो आने वाले पांच में क्या कुछ नहीं करूंगा... आओ तो फिर मैं साइकिल चलाता हूं, तुम पीछे बैठ जाओ।
राहुल- ठीक है, बैठ गया.... अब चलो
अखिलेश- अरे ऐसे बैठ जाओगे तो साइकिल कैसे चलाऊंगा? इसलिए थोड़े ही तुम्हें साथी बनाया है... पहले थोड़ा धक्का देना और फिर जब साइकिल चल पड़े तो पीछे कैरियर पर बैठ जाना। चलो लगाओ धक्का.. सब्बास! सब्बास! चल गई.. चल गई.. चल गई मेरी साइकिल..
राहुल- भैया.. अखिलेश भैया.. धीमा करो मैं तो पीछे रह गया.. मैं साइकिल पर बैठ ही नहीं पाया.. सुनो........
(यह एक व्यंग्य लेख है)












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