Guru Nanak Jayanti: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के बारे में जानें 10 खास बातें
Guru Nanak Jayanti: सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव के बारे में जानें 10 खास बातें
नई दिल्ली, 18 नवंबर: भारत में कई धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं। भारत में माने जाने वाले अनेक धर्मों में से एक सिख धर्म है, जो दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा धर्म है। सिख धर्म के संस्थापक सिखों के पहले गुरु गुरु नानक देव जी थे। देशभर में 19 नवंबर 2021 को यानी कार्तिक पूर्णिमा को गुरु नानक देव जी की 552वीं जयंती मनाई जाएगी। जिसे गुरु नानक के प्रकाश उत्सव या गुरु नानक जयंती के नाम से भी जाना जाता है। पारंपरिक चंद्र कैलेंडर के मुताबिक गुरुपर्व की तारीख साल-दर-साल बदलती रहती है। हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार जहां दिवाली कार्तिक महीने के 15वें दिन पड़ती है, वहीं गुरु नानक जयंती उसके पंद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा के शुभ अवसर पर पड़ती है। गुरु नानक देव अपने राजनीतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विश्वासों के लिए जाने जाते हैं। गुरु नानक देव जी ने हमेशा 'सभी के लिए समानता' का संदेश दिया, चाहे उनका धर्म, जाति या लिंग कुछ भी हो। उनका कहना था कि ईश्वर शाश्वत सत्य है।

आइए गुरु नानक देव जी की 552वीं जयंती पर जानें उनके बारे में 10 खास बातें
1. गुरु नानक का जन्म 15 अप्रैल, 1469 को हुआ था। उनकी जयंती कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। गुरु नानक जी के पिता का नाम मेहता कालू जी और माता का नाम तृप्ता था। इनका जन्म तलवंडी, ननकाना साहिब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनकी एक बड़ी बहन भी थी। जिनका नाम बेबे नानकी था।
2. गुरु नानक ने सात साल की उम्र में स्कूल जाना शुरू कर दिया था। कहा जाता है कि सात साल की उम्र में उनके पिता कालू मेहता ने उन्हें गांव के स्कूल में दाखिला दिलाया। ऐसा माना जाता था कि उन्होंने अपने शिक्षक को वर्णमाला के पहले अक्षर का प्रतीकवाद समझाकर आश्चर्यचकित कर दिया था। जो कि फारसी या अरबी में यह एक सीधा स्ट्रोक है, जो एक के गणितीय संस्करण जैसा दिखता है।

जब जनेऊ पहनने से इंकार कर दिया था गुरु नानक देव ने
3. गुरु नानक ने एक बच्चे के रूप में जनेऊ (हिन्दुओं में पहनने वाला पवित्र धागा) पहनने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि वह अपनी सुरक्षा के लिए भगवान का सच्चा नाम अपने दिल में बसाएंगे। उन्होंने तर्क दिया था कि जनेऊ टूट सकता है, गंदा हो सकता है, जल सकता है या खो सकता है और कोई सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता।
4. कहा जाता है कि जब गुरु नानक देव जी 12 वर्ष के थे तो उनके पिता ने उन्हें 20 रुपए दिए और कहा था कि इससे एक व्यवसाय करो। लेकिन गुरु नानक देव जी ने सभी पैसों से भोजन खरीदा और गरीब संतों में बांट दिया। जब गुरु नानक से पिता ने उससे पूछा कि व्यापार का क्या हुआ? उसने उत्तर दिया कि उसने "सच्चा व्यवसाय" किया है।
बाद में जिस स्थान पर गुरु नानक देव ने गरीबों को खाना खिलाया था, उस स्थान पर एक गुरुद्वारा बनाया गया, इसका नाम 'सच्चा सौदा' है।

जब तीन दिन के लिए गायब हो गए थे गुरु नानक देव
5. 18 साल की उम्र में गुरु नानक ने 24 सितंबर 1487 को माता सुलखनी से शादी की। उनके दो बेटे श्री चंद और लक्ष्मी चंद थे।
6. कहा जाता है कि एक दिन गुरु नानक अपने स्नान कर घर नहीं लौटे। उनके कपड़े नदी किनारे मिले थे। स्थानीय लोगों को लगा कि उसकी मौत हो गई है। तीन दिन बाद वह वापस लौट आए और वह चुप रहे। बाद में उन्होंने कहा कि उन्हें भगवान के दरबार में ले जाया गया और वहां उन्हें अमृत से भरा प्याला दिया गया और उन्हें आशीर्वाद दिया गया।
7. गुरु नानक देव ने ईश्वर का संदेश को फैलाने के लिए पूरे भारत और मध्य पूर्व की यात्रा की थी। मक्का में गुरु नानक काबा मस्जिद की ओर अपने पैरों के साथ सोते हुए पाए गए थे। काजी रुकान-उद-दीन ने इसे देखने के बाद गुस्से में गुरु नानक से विरोध किया। जिसका जवाब देते हुए गुरु नानक ने कहा था, अपने पैरों को उस दिशा में मोड़ना संभव नहीं है जिसमें भगवान या भगवान का घर न हो। काजी समझ गए कि गुरु जो कह रहे थे उसका अर्थ "भगवान हर जगह है"।

15वीं शताब्दी में 'सिख धर्म' की नींव रखी थी गुरु नानक देव ने
8. गुरु नानक देव जी ने 15वीं शताब्दी में 'सिख धर्म' की नींव रखी थी। गुरु नानक की शिक्षाओं को सिख ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में लिखा गया है।
9. गुरु नानक ने सिख पवित्र ग्रं गुरु ग्रंथ साहिब में मुख्य रूप से तीन शिक्षाएं दी हैं। 'वंद चाको ', 'किरात करो' और 'नाम जपना'। वंद चाको का अर्थ है, दूसरों और जरूरतमंद लोगों की मदद करना। किरात करो का अर्थ है- किसी का भी शोषण और बिना किसी धोखाधड़ी के ईमानदारी से जीवन यापन करना। वहीं नाम जपना' का मतलब है, भगवान की भक्ति में लीन रहना।
10. गुरु नानक का 70 वर्ष की आयु में 22 सितंबर 1539 में निधन हो गया था। उन्होंने भाई लीना को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और उनका नाम बदलकर गुरु अंगद कर दिया था।
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