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अफगानिस्तान में अमेरिका की हालत धोबी के कुत्ते जैसी

अमेरिका की फौजें अफगानिस्तान में बुरी तरह से फंस गयी हैं। सैन्य विषयों के जानकार बताते हैं कि अफगानिस्तान में अमरीका की जकड़न, उसकी वियतनाम में हुई दुर्दशा से भी भयावह है। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति के पूर्ववर्ती जार्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान में सैनिक कार्रवाई शुरू की थी। पता नहीं किस मुगालते में उन्होंने यह सोच लिया था कि अफगानिस्तान के तालिबान हुक्मरान को ख़त्म करने के लिए उन्हें पाकिस्तान से मदद मिलेगी।

अमेरिकी नीतिकारों की अक्ल पर पड़े हुए परदे ने उन्हें यह देखने ही नहीं दिया कि पाकिस्तानी फौज की एक शाखा के रूप में काम करने वाले तालिबान के खिलाफ पाकिस्तानी सेना कैसे काम करेगी। उस पर तुर्रा यह कि उस वक़्त के पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ खुद तालिबान के संरक्षक थे।

बहरहाल अरबों अरब डालर खर्च करके अब अमरीका को लगने लगा है कि गलती हो गयी। इस बीच अमरीकी फौज की गफलत के चलते तालिबान फिर से संगठित हो गए हैं और अब अमेरिकी सेना के सामने एक बड़ी चुनौती खडी है। पता चला है कि तालिबान के गढ़ , कंदहार और उसके आस-पास के इलाकों में तालिबान इतने मज़बूत हो गए हैं कि उनको वहां से हटाने के लिए अमरीकी सेना ने अब तक का सबसे ज़बरदस्त सैनिक अभियान शुरू कर दिया है।

नैटो के प्रवक्ता, ब्रिगेडियर जनरल जोसेफ ब्लोट्ज़ बताया कि पिछले एक हफ्ते से अर्घंदाब, ज़हरी और पंजवाई जिलों में तालिबान के सफाए के प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो गया है। उन्हें उम्मीद है कि लड़ाई ज़बरदस्त होगी। आज की ज़मीनी सच्चाई यह है कि तालिबान ने अपने सबसे मज़बूत ठिकाने, कंदहार में पाँव जमा लिए हैं और उनको वहां से हटाने के बाद ही अफगानिस्तान में अमरीकी फौजों का पलड़ा भारी पडेगा। जहरी जिले के पुलिस प्रमुख बिस्मिल्ला खान ने बताया अमरीकी और अफगान फौजों का हमला पिछले एक हफ्ते से जारी है लेकिन नतीजों के बारे में किसी को कुछ नहीं मालूम।

अफगानिस्तान में अमरीकी मुसीबतों के कारण तालिबान ही नहीं है। वे राष्ट्रपति हामिद करज़ई से भी परेशान हैं। अमरीका की तरफ से अफगानिस्तान को संभाल रही खुफिया एजेंसी सीआईए से करज़ई की पटरी नहीं बैठ रही है। सीआईए ने आरोप लगाया है कि हामिद करज़ई अक्सर नशे में टुन्न रहते हैं। सीआईए का आरोप है कि जिस अफगानिस्तान में अमरीकी टैक्स का 120 अरब डालर हर साल फूंका जा रहा है, वहां का राष्ट्रपति अगर नशेड़ी होगा तो कैसे गुज़र होगा। सीआईए ने यह भी रिपोर्ट दी है कि करज़ई की पागलपन की बीमारी इतनी ज़बरदस्त है कि कई बार उनका इलाज़ करवाना पड़ा है। खबर यह भी है कि वे बहुत ही भ्रष्ट आदमी हैं और उनके कई रिश्तेदार ड्रग्स के कारोबार में लगे हुए हैं और सबको हामिद करज़ई का संरक्षण प्राप्त है।

अमरीकी रक्षा विभाग ने कई बार करज़ई को यह सलाह दी है कि वे राजपाट छोड़कर दुबई में जाकर अपना घर बसायें लेकिन अभी करज़ई इसके लिए तैयार नहीं हैं। इस साल की शुरुआत में अफगानिस्तान में अमरीकी राजदूत, पीटर गालब्रेथ ने आरोप लगाया था कि करज़ई मादक दवाओं का सेवन करते हैं और उनका दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहता। गालब्रेथ ने कहा था कि उनके पास राष्ट्रपति के आवास के अन्दर रहने वालों की तरफ से सूचना आई थी कि करज़ई हशीश का दम भी लगाते हैं। अपनी चिट्ठी में गालब्रेथ ने मांग की है कि करज़ई के बारे में अमरीका को अपनी नीतियों पर फिर से विचार करना पडेगा क्योंकि उनकी नज़र में करज़ई बिल्कुल बेमतलब के आदमी हैं।

उधर पाकिस्तान में भी अमरीकी नीति पूरी तरह से पराजित हो गयी है। पाकिस्तान के उत्तरी इलाकों में तालिबान और अल-कायदा के ज़्यादातर आतंकवादी छुपे हुए हैं। उनके खिलाफ जब अमरीकी सेना ने हमले की योजना बनायी तो उसे पाकिस्तानी सेना को भी साथ लेना पड़ा। पाकिस्तानी सेना पर आईएसआई के असर का नतीजा है कि उस अभियान में शामिल ज़्यादातर सैनिक तालिबान के हमदर्द ही थे और अमरीकी सेना के बारे में तालिबान तक पूरी खबर पंहुचाते थे।
ज़ाहिर है अमरीका का यह काम भी बट्टे खाते में ही जाएगा। ऐसी हालत में अब यह साफ़ हो गया है कि अपने अफगानिस्तान के मिशन में अमरीका बुरी तरह से फंस गया है और उसकी हालत वहां वियतनाम से भी खराब होने वाली है। राष्ट्रपति बराक ओबामा इस सारी मुसीबत से बच निकलने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं शायद इसीलिए उन्होने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की घर वापसी अभियान पर जोर दिया है।

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