गद्दाफी की लालबुझक्कड़ी कूटनीति

संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में अपने सौ मिनट के भाषण में कर्नल गद्दाफी ने यह साबित कर दिया कि उनके दिमागी संतुलन के बारे में कही जाने वाली कहानियों में सच्चाई भी हो सकती है। अब यह आरोप तो नही लगाया जा सकता कि वाशिंग्टन में उनके द्वारा दिए गए भाषण के लिए उन्हें किसी ने मजबूर किया होगा। गौर करने की बात है कि उन्हें पहली बार विश्व संस्था के सामने भाषण देने का मौका मिला। भाषण खुद गद्दाफी ने तैयार किया था यानि उन्होंने खुद अपने दिमाग का इस्तेमाल कर वहां प्रलाप किया। जिसके बाद उनके मानसिक असंतुलन के बारे में कोई शक नहीं रह जाता।
इस बात में कोई शक नहीं कि कर्नल को अंतराष्ट्रीय संबंधों की बारीकियों की कोई जानकारी नहीं। क्योंकि अंतराष्ट्रीय मंच पर किसी ऐसे देश की समस्या को उठाना जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं उनकी अपरिपक्वता की ओर इशारा करता है। अपनी इसी अपरिपक्वता का परिचय देते हुए गद्दाफी ने कश्मीर की समस्या पर चर्चा की। हालांकि सच्चाई यह है कि गद्दाफी या उनके देश लीबिया का कश्मीर मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है लोकिन उनका कश्मीर मामले पर खुद को एक पार्टी बना देना पूरी तरह से उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता को दर्शाता है। अपने भाषण में कश्मीर की समस्या पर चर्चा कर गद्दाफी ने न केवल भारत को नाराज किया बल्कि अपने दोस्त पाकिस्तान को भी ज्यादा खुश नहीं किया। क्योंकि पाकिस्तान भी कश्मीर को एक स्वतंत्र देश के रुप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है बल्कि वह उसे अपने साथ मिलाना चाहता है। और जहां तक भारत का संबंध है तो कश्मीर उसका एक राज्य है जो देश के बंटवार के बाद कश्मीर के राजा हरि सिंह के दस्तखत के बाद भारत का हिस्सा बना था।
कर्नल मुअम्मर गद्दाफी ने अपने भाषण के बाद अपने दुश्मनों की संख्या में खासा इजाफा कर लिया है। गद्दाफी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् को अपमानित करते हुए उसे 'आतंकवादी परिसर' बताया और कहा कि अगर सुरक्षा परिषद् का विस्तार हुआ तो दुनिया में न सिर्फ गरीबी और नाइंसाफी बढ़ेगी बल्कि तनाव भी बढ़ेगा। ऐसा लगता है कि जिस मानसिक मनोदशा से अभिभूत होकर गद्दाफी भाषण कर रहे थे उसमें कोई तार्किक बात ढ़ूंढ़ने की कोशिश भी नहीं की जा सकती। पता नहीं कैसे उन्होंने अनुमान लगा लिया कि आने वाले वक्त में इटली, जर्मनी, इंडोनेशिया, भारत, पाकिस्तान, फिलीपीन, जापान, अर्जेंटीना और ब्राजील के बीच बहुत प्रतिस्पर्धा होगी। उनके दिमाग में कहीं से यह बात आ गई है कि अगर भारत को सुरक्षा परिषद में जगह दी गई तो पाकिस्तान भी जगह मांगेगा। बहुत पहले, भारत और पाकिस्तान को एक तराजू पर तौलना अमरीकी विदेश भानीति की एक प्रमुख धारा हुआ करती थी लेकिन भारत के चौतरफा विकास के बाद अब अमरीका इस नीति को छोड़ चुका है। यहां तक कि पाकिस्तान भी अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और वह भी अब अपने को भारत के बराबर नहीं मानता। इसलिए पाकिस्तान और भारत को बराबर करने की कोशिश करके गद्दाफी अपने कूटनीतिक अज्ञान का ही परिचय दे रहे थे।
गद्दाफी की कल्पना शक्ति ने कुछ और भी कारनामे दिखाए। उन्होंने मांग की कि सदियों तक अफ्रीका को उपनिवेश बनाए रखने वाले मुल्क 70.77 खरब डॉलर का मुआवजा दें। पता नहीं कहां से उन्होंने यह आंकड़ा अर्जित किया था। बहरहाल जिस रौ में वे बोल रहे थे, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि उनके मुंह से कुछ भी निकल सकता था और वे उन आंकड़ों के प्रति प्रतिबद्घ तो बिलकुल नहीं नजर आ रहे थे। लेकिन उनकी कल्पना शक्ति की उड़ान यहीं खत्म होने वाली नहीं थी। उन्होंने उन डाकुओं का
भी समर्थन किया जो सोमालिया के समुद्री क्षेत्र और उसके बाहर के इलाकों में जहाजों को लूटने का धंधा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि डाके का काम करने वाले लोग डाकू नहीं हैं। उन्होंने स्वीकार
किया वास्तव में पुराने वक्त में लीबिया ने वहां जाकर सोमालिया के लोगों की जलसंपदा का हरण किया था इसलिए उनका अपना देश भी डाकू है। लेकिन इसके बात गद्दाफी फिर बहक गए और उन्होंने भारत, जापान और अमरीका को भी जल डाकू घोषित कर दिया। विश्व बिरादरी के लिए मुश्किल की बात यह है कि इस मानसिक दशा का व्यक्ति आजकल अफ्रीकी देशों के संगठन का भी अध्यक्ष है
और अगर वह बहकी-बहकी बातें करता रहेगा तो कूटनीति के मैदान में अफ्रीकी देशों का बहुत नुकसान होगा।
क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उल-जलूल बात करने वाले की बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता। हो सकता है कि संयुक्त राष्ट के मंच पर पहली बार अवसर मिलने के बाद गद्दाफी भाव विह्वiल हो गए हों और जो भी मन में आया बोलने लगे हों। यह भी हो सकता है कि उन्हें यह मुगालता हो कि संयुक्त राष्ट के मंच पर कुछ भी कह देने का कोई मतलब नहीं है, इसलिए दिल खोलकर भड़ास निकाल लो। ऐसा इसलिए कि अपने इसी भाषण में गद्दाफी ने संयुक्त राष्टजनरल असेंबली की तुलना लंदन के हाइड पार्क के 'स्पीकर्स कार्नर' से की जहां कोई भी आकर भाषण कर सकता है और अपनी भड़ास निकाल सकता है यानी उन्होंने खुद ही स्वीकार कर लिया कि वे एक प्रलाप कर रहे हैं जिसका कोई भी मतलब नहीं है। उनका यह विश्वास सच लगता है कि उनके लंबे भाषण को सुनने के लिए बहुत कम लोग बचे थे।
[शेष नारायण सिंह वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हैं।]












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