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वंदेमातरम्‌ की नहीं, रोटी की बात करें

Muslims
जमीयत उलेमा हिन्द के तीसवें अधिवेशन में वंदेमातरम्‌ के गाने के खिलाफ फतवे ने एक बार फिर भूचाल ला दिया। सबसे पहले तो यह कि जब पहले से ही जमीयत का वंदेमातरम्‌ पर रुख साफ है तो इस मुद्‌दे को क्यों बार-बार हवा देकर भावनाएं भड़काने का काम किया जाता है? वहीं दूसरी ओर जमीयत उलेमा हिन्द ऐसे मुद्दों पर फतवे जारी करने के बजाए मुसलमानों की बुनियादी जरुरतों पर ध्यान क्यों नहीं देती। देश के मुसलमान गरीबी, आशिक्षा, भुखमरी और खराब स्वास्थ्य जैसी कितनी ही समस्याओं से जूझ रहे हैं लेकिन जमीयत को उनसे कोई सरोकार नहीं। कभी उन्होंने महिला शिक्षा की बात क्यों नहीं की? सभी को मालूम है कि मुसलमानों में शिक्षा का स्तर क्या है लेकिन ऐसे मसलों से तो जैसे इन्हें कोई सरोकार ही नहीं। जमीयत बुनियादी इंसानी जरुरतों को नजरअंदाज करके ऐसे मुद्दों को हवा दे रही है, जिनसे समाज में केवल नफरत ही फैल सकती है।

वंदेमातरम्‌ गाना या न गाना किसी की इच्छा पर निर्भर करता है। न तो इस पर किसी को न गाने का दबाव दिया जा सकता है और न ही जबरदस्ती गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। वंदेमातरम्‌ गाने से न तो कोई देशभक्त बन सकता है और न ही ना गाने से देशद्रोही हो जाता है। वंदेमातरम्‌ गाने वाले देश में बम धमाके करके देशद्रोही होने का सबूत दे चुके हैं तो न गाने वाले देश के सम्मान के लिए जान भी न्योछावर करते रहे हैं। इसलिए वंदेमातरम्‌ को देशभक्ति से जोड़कर देखने वाले अहमक हैं।

आज देश की गरीब ही नहीं निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग कही जानी वाली जनता के सामने रोटी की गम्भीर समस्या पैदा हो गयी है। आटा, दाल, चीनी और दूध जैसी बुनियादी चीजों पर मंहगाई की मार है। आम आदमी त्राहि-त्राहि कर रहा है। जमीयत ने मंहगाई के खिलाफ अपना मुंह क्यों नहीं खोला? संघ परिवार कभी भी अपने अधिवेशनों में रोटी की बात नहीं करता। उसे केवल हिन्दुत्व की चिंता रहती है। हिन्दुत्व भी वह, जिससे सिर्फ घृणा ही फैलती है।

कहते हैं भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता। क्या वंदेमातरम्‌ गाकर आदमी का पेट भर सकता है? या न गाने से मुसलमानों की समस्याएं खत्म हो जाती हैं? देश की प्रति वफादारी अपनी जगह है। लेकिन देश पर हुकूमत करने वाले लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वह जनता को दो जून की रोटी मुहैया कराएं। अक्सर देखा गया है कि जब भी मंहगाई बढ़ती है तो कुछ राज्य सरकारें अपनी तरफ से सस्ती चीजें बेचने के लिए कुछ दुकानें लगाती हैं। क्या इतने मात्र से ही मंहगाई पर काबू पाया जा सकता है? सवाल यह है कि देश की जनता को सरकार यह क्यों नहीं बताती कि चीनी 20 से 40 रुपए क्यों हो गयी है ? आटा क्यों 20 रुपए किलो बिकने लगता है और घी -तेल में क्यों रातों-रात आग लग जाती है? आखिर कीमते बढ़ने की कुछ तो वजह होती है? क्या सरकार जमाखोरों के आगे घुटने टेकने के लिए अलावा कुछ नहीं कर सकती? क्या कानून का डंडा जमाखोरों और मुनाफाखोरों के लिए नहीं है? क्या सरकार उस वक्त का इंतजार कर रही है, जब भूखी जनता दुकानों में लूटपाट शुरु कर देगी? क्या आगरा की घटना इसकी शुरुआत मानी जाए ? खुदा न करे यदि ऐसा हुआ तो भी सरकार का चाबुक उन्हीं गरीबों की पीठ पर पड़ेगा, जो भूख से मजबूर होकर अपना आपा खो बैठेंगे और सुरक्षा होगी उन जमाखोरों की जो, अनाज को मनमाने दामों पर बेचकर अपनी तिजोरियां भरते हैं।

पहले भी कहता रहा हूं आज भी कहता हूं आजकल की सरकारें गरीबों को केवल वोट देने वाली भेड़ों के अलावा कुछ नहीं समझतीं। सरकार गरीब लोग ही बनाते हैं। अमीर लोगों को तो वोट देना भी बेकार का काम लगता है। इसलिए वंदेमातरम्‌ गाने या न गाने की बहस में न उलझकर रोटी की चिंता कीजिए। याद रखिए वंदेमातरम्‌ पर बहस चलाने वालों को रोटी की चिंता नहीं है। इनके पेट भरे हुए हैं। ये लोग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं। इन्हें नहीं पता कि आटे का क्या भाव हो गया है। इसलिए ये लोग कभी भी रोटी की बात नहीं करते। भूख कभी इनके एजेंडे में नहीं रही। देश के गरीबों को एक बात समझ लेनी चाहिए के राजनैतिक दलों ने हमें धार्मिक जाति और क्षेत्रीयता में इसलिए बांट दिया है ताकि गरीब लोग एक साथ इकट्ठा होकर इनके गिरेबां पर हाथ न डाल सकें। सही बात तो यह है कि गरीब न हिन्दू होता न मुसलमान। भूख की आग हिन्दू के पेट को भी उतना ही जलाती है जितना मुसलमान के पेट को।

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