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Shatak Movie Review: विश्वास, संघर्ष और संगठन की कहानी बयां करती है यह फिल्म, ये हैं देखने की वजहें

Shatak Movie Review: आज हम जिस भारत को देखते हैं, वहां हर मुद्दे पर खुलकर बहस होती है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक राय बनती और बदलती रहती है। लेकिन इन सबकी जड़ें अतीत में छिपी हैं। करीब सौ साल पहले शुरू हुआ एक संगठन आज भी चर्चा में है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)। समय बदला, हालात बदले, लेकिन इसके नाम पर बातचीत और मतभेद दोनों जारी रहे। फिल्म 'शतक' इसी पुराने दौर को आज के नजरिए से देखने की कोशिश है। यह कहानी को घुमा-फिराकर नहीं, सीधे तरीके से सामने रखती है। दिखाती है कि कैसे एक छोटी शुरुआत धीरे-धीरे बड़े रूप में बदल गई। फिल्म अतीत और वर्तमान के बीच एक सीधा संबंध जोड़ती है, ताकि समझ आ सके कि आज की तस्वीर किस तरह कल से बनकर आई है।

Shatak Movie Review

शुरुआत जहां विचार आकार लेता है
फिल्म एक ऐसे माहौल में कदम रखती है, जहां सब कुछ छोटा दिखता है लोग, संसाधन, दायरा। लेकिन सोच छोटी नहीं है। 'शतक' धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बनाती है और दर्शक को उस सफर पर ले जाती है, जहां एक बीज समय के साथ वृक्ष बनता है। कहानी घटनाओं को घुमाकर नहीं, सीधे सामने रखती है। टेक्निकल स्तर पर फिल्म मजबूत है, लाइव एक्शन और विजुअल इफेक्ट्स मिलकर कई दृश्यों को इतना जीवंत बना देते हैं कि लगता है आप दर्शक नहीं, उस दौर के गवाह हैं।

किरदार जो प्रतीक बन जाते हैं
डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार को यहां किसी चमकदार फ्रेम में नहीं, बल्कि सादगी के साथ रखा गया है। सीमित साधन, छोटे समूह, लेकिन साफ दिशा। स्क्रीन पर उनकी यात्रा बताती है कि बड़े बदलाव अक्सर शांत शुरुआत से जन्म लेते हैं। जब कहानी माधव सदाशिव गोलवलकर के दौर में पहुंचती है, तो हवा का रंग बदल जाता है। आज़ादी के बाद का अस्थिर समय, गांधी हत्या के बाद लगा प्रतिबंध, ये सब बिना ऊंची आवाज के दिखाया गया है, लेकिन भीतर का तनाव साफ महसूस होता है। संघर्ष की वह परत कहानी को और गहरा बना देती है।

इतिहास के वे पन्ने जो कम बोले गए
दादरा और नगर हवेली से लेकर कश्मीर तक, फिल्म उन मोड़ों को छूती है जिन पर अक्सर कम रोशनी पड़ती है। यहां शोर नहीं है, लेकिन असर है। यह एहसास होता है कि इतिहास सिर्फ मंचों पर नहीं, कई बार खामोश कमरों में भी लिखा जाता है। सबसे दिल छू लेने वाले पल तब आते हैं जब युवा घर छोड़ते दिखते हैं, पीछे खड़े परिवार, आंखों में चिंता और गर्व साथ-साथ। ये दृश्य कहानी को इंसानी चेहरा देते हैं। फिल्म यहां जानकारी से आगे बढ़कर भावनाओं में बदल जाती है।

लेखन बांधे रखता है
स्क्रिप्ट की ताकत साफ महसूस होती है। नितिन सावंत, रोहित गहलोत और उत्सव दान ने घटनाओं को ऐसे पिरोया है कि विषय गंभीर होते हुए भी भारी नहीं लगता। कहानी सीधी चलती है और दर्शक बिना भटके उसके साथ बना रहता है। पूरे ढांचे की बुनियाद अनिल धनपत अग्रवाल के कॉन्सेप्ट पर टिकी है। उनका विजन एक विचार की यात्रा को सिर्फ बताने का नहीं, उसे जीने का एहसास देने का है।

निर्देशन और प्रस्तुति का संतुलन
डायरेक्टर आशीष मॉल ने फिल्म को नियंत्रित टोन में रखा है। कहीं अनावश्यक ड्रामा नहीं, कहीं भावनाओं का दिखावा नहीं। जहां ठहराव चाहिए, वहां ठहराव है। प्रोड्यूसर वीर कपूर का सपोर्ट फिल्म के स्केल और गुणवत्ता में झलकता है। प्रोडक्शन वैल्यू मजबूत है और पूरी फिल्म में एक सधा हुआ पेशेवर अंदाज महसूस होता है।

क्यों देखें 'शतक'?
इस फिल्म की क्रिएटिव टीम खास तारीफ की हकदार है। इसका कॉन्सेप्ट अनिल डी. अग्रवाल ने तैयार किया है। कृधान मीडियाटेक के बैनर तले बनी इस फिल्म को आशीष मॉल ने डायरेक्ट किया है। प्रोड्यूसर वीर कपूर हैं और को-प्रोड्यूसर आशीष तिवारी, जो एडा 360 डिग्री एलएलपी से जुड़े हैं। पूरी फिल्म में मेहनत, सच्चाई और विषय के प्रति सम्मान साफ दिखाई देता है। कहीं भी सनसनी फैलाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि कहानी को अपने स्वाभाविक ढंग से आगे बढ़ने दिया गया है ताकि हर पल असर छोड़ सके।

'शतक' सिर्फ एक ऐतिहासिक फिल्म नहीं लगती, यह विश्वास, धैर्य और चुपचाप काम करने वाली प्रतिबद्धता को सलाम करती है। इसे देखते हुए संगठन के पीछे के मानवीय पहलू सामने आते हैं और देश की बड़ी यात्रा पर सोचने का मौका मिलता है। आखिरी सीन तक पहुंचते-पहुंचते आप सिर्फ पहले पचास साल समझते नहीं, उन्हें महसूस करते हैं और आगे की कहानी का इंतजार भी करने लगते हैं। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि यह फिल्म इसी वजह से मस्ट वॉच बनती है।

डायरेक्शन: आशीष मॉल
रेटिंग: 3.5/5 स्टार्स

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