ज्योतिष में कैसे बनते हैं वर्षा के योग?
नई दिल्ली, 20 अप्रैल। ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु का प्रकृति के साथ समस्त प्राणियों को भी इंतजार रहता है। वर्षा ऋतु में प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़ती है और पृथ्वी पर खाद्यान्न उत्पन्न होता है। इसलिए वर्षा जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्योतिष में उत्तम वर्षा होने के अनेक योग बनते हैं। ग्रह-नक्षत्रों के संयुक्त होने के कारण वर्षा के मेघ उत्पन्न होते हैं।

आइए जानते हैं कैसे बनते हैं वर्षा योग। नारद पुराण में ज्योतिष के विभिन्न तत्वों का विस्तार से वर्ण मिलता है, जिनमें वर्षा के संबंध में भी बताया गया है।
- वर्षाकाल में आद्र्रा से स्वाति नक्षत्र तक सूर्य के विचरण करने पर चंद्रमा यदि शुक्र से सप्तम स्थान अथवा शनि से पंचम, नवम या सप्तम स्थान पर हो तथा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो उस समय अवश्य वर्षा होती है।
- यदि बुध और शुक्र एक ही राशि में समीपवर्ती हों तो तत्काल वर्षा होती है। किंतु इन दोनों के बीच यदि सूर्य आ जाए तो वर्षा नहीं होगी।
- यदि मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, नक्षत्रों में सूर्य के गोचर के समय शुक्र पूर्व दिशा में उदित हो तथा स्वाति, विशाखा, अनुराधा नक्षत्रों में सूर्य के विचरण के समय शुक्र पश्चिम दिशा में उदय हो तो निश्चित वर्षा होती है। इससे विपरीत होने पर वर्षा का अभाव होता है।दक्षिण गोल तुला से मीन तक के सूर्य के रहते हुए यदि शुक्र सूर्य से वाम भाग में पड़े तो अवश्य वर्षा होती है।
- यदि सूर्य के पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में प्रवेश के समय आकाश में मेघ छाए हो तो आद्र्रा से मूल पर्यन्त प्रतिदिन वर्षा होती है।
- यदि रेवती में सूर्य के प्रवेश करते समय वर्षा हो जाए तो उससे दस नक्षत्र रेवती से अश्लेषा तक वर्षा नहीं होती।
- चंद्र मंडल में घेरा हो और उत्तर दिशा में बिजली चमके या मेंढको का शब्द सुनाई पड़े तो निश्चय ही वर्षा होती है।
- इसके अतिरिक्त भी अनेक ग्रह-नक्षत्र संयोग हैं जिनमें वर्षा होने, न होने के योग बनते हैं।












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