त्रिखल दोष : एक भयानक दोष, जिसका निवारण है जरूरी
नई दिल्ली। वैदिक ज्योतिष में अनेक प्रकार के योग और दोष का वर्णन मिलता है। योग वे होते हैं जो जातक के जीवन में शुभ प्रभाव लाते हैं और दोष वे होते हैं जो जातक के जीवन में समस्याएं और कष्ट देते हैं। एक ऐसा ही दोष है त्रिखल दोष। यह दोष मुख्यत: दो प्रकार को होता है, जिनमें से एक दोष की चर्चा आमतौर पर अधिक की जाती है। यह है, जब किसी घर में तीन पुत्रियों के बाद पुत्र संतान का जन्म हो या तीन पुत्रों के बाद पुत्री संतान का जन्म हो तो त्रिखल दोष होता है। यह दोष शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल देता है।

तीन पुत्र के बाद पुत्री जन्म का फल
यदि किसी के घर में तीन पुत्र संतान के बाद कन्या का जन्म हुआ हो तो यह शुभ संकेत माना जाता है। जिस दिन से कन्या का जन्म होता है उसी दिन से घर में बरकत शुरू हो जाती है। यदि घर के मुखिया के पास आजीविका को कोई साधन ना हो। उसके पास कोई नौकरी या व्यापार नहीं हो तो पुत्री जन्म के बाद से उसे आय के साधन प्राप्त होना शुरू हो जाते हैं। व्यापार में वृद्धि होना शुरू हो जाती है। लेकिन इस प्रकार की कन्या का जन्म उसकी माता के लिए शुभ नहीं होता है। कन्या जन्म के बाद से माता शारीरिक रोगों से पीड़ित हो जाती है। उसे बार-बार बीमारियां घेर लेती हैं और इन बीमारियों से कभी छुटकारा नहीं मिलता। एक बीमारी दूर होते ही दूसरी हो जाती है।
तीन पुत्रियों के बाद पुत्र जन्म का फल
तीन पुत्रियों के जन्म के बाद यदि पुत्र का जन्म हुआ हो तो यह उस बच्चे के पिता और परिवार के लिए ठीक नहीं होता है। पुत्र के जन्म के बाद से घर में लगातार कोई न कोई परेशानी आने लगती है। आर्थिक हानि होती है। व्यापार-व्यवसाय लगातार गिरने लगता है। कोई भी काम पूरा नहीं होता। कार्यों में रूकावटें आती हैं। ऐसे पुत्र के जन्म से पिता तथा नाना के पक्ष को भय, रोग एवं धनहानि होती है। पिता को लगातार मानसिक तनाव बना रहता है। विवादित स्थितियां बनती रहती हैं। इस दोष में जन्में पुत्र को भी जीवन में कई बार मृत्युतुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है।

एक अन्य प्रकार का त्रिखल दोष
उपरोक्त वर्णित दोनों स्थितियों के अलावा एक अन्य प्रकार का त्रिखल दोष भी होता है। इसके अनुसार किसी जातक की जन्मकुंडली में त्रिखल दोष तब बनता है जब एक ही ग्रह तीन अलग-अलग परिस्थितियों में मौजूद होता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के जन्म समय में सूर्य कृतिका, उत्तराषाढ़ा या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में हो तथा जन्मकुंडली में सूर्य पहले या दसवें भाव में स्थित हो तो त्रिखल दोष का निर्माण होता है। क्योंकि इन नक्षत्रों का स्वामी सूर्य है। प्रथम और दशम भाव का कारक ग्रह भी सूर्य है। इस प्रकार की स्थिति हो तो भी त्रिखल दोष होता है।

दोष का निवारण अत्यंत जरूरी
जब त्रिखल दोष हो तो इसका निवारण करवाना अत्यंत जरूरी है। इसके लिए बालक या बालिका के जन्म के 11वें दिन विशेष पूजा करवाई जाती है, जिससे घर में सुख-शांति बनी रहती है। आमतौर पर जन्म के 10 दिन तक सूतक माना जाता है। यह पूजा सूतक समाप्ति के बाद 11वें दिन करवाई जाती है। इसके लिए शुभ मुहूर्त में पति-पत्नी शुद्ध आसन पर पूर्वाभिमुख होकर, संकल्प पूर्वक गणपति पूजन, नवग्रह पूजन आदि करें। उसके बाद कलश स्थापना करते हुए उसके ऊपर ताम्रपात्र रखकर उस पर श्रीहरि की स्वर्ण या ताम्र की मूर्ति स्थापित करके पूजा की जाती है। विधिपूर्वक त्रिखला दोष शांति कर्म की कर्मकांडी पंडित से करवाएं। त्रिखल पूजा के बाद दान में तीन प्रकार के अन्न्, तीन वस्त्र, तीन धातु (सोना, चांदी, तांबा) तथा साथ में गुड़, एक लाल पर्ण व नारियल और दक्षिणा सहित संकल्प पूर्वक पुत्र/पुत्री और उसकी माता का हाथ लगवा कर मंदिर में या कुल ब्राह्मण को दान करना चाहिए। यदि त्रिखल दोष के बारे में जानकारी ना हो और बाद में पता लगे तो कोई डरने या घबराने की बात नहीं है, बाद में भी यह पूजा करवाई जा सकती है।
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