Motivational story: पैसा कमाने की धुन जीवन के सुख को खत्म कर देती है
नई दिल्ली। धन की माया सब पर भारी, बहुत ही सामान्य सी बात है, जिसे लगभग हर कोई मानता है। दुनिया में ऐसा कोई नहीं, जो धनवान नहीं बनना चाहता। हर कोई धन की महिमा से परिचित है क्योंकि यही वह साधन है, जो आज के जमाने में सब को साध लेता है, बिगड़े हुए को संवार देता है। जिसके पास धन है, समाज में उसका रूतबा है और दुनिया उसके सामने झुकती है।

यही वजह है कि हर कोई धन कमाने के पीछे भाग रहा है। लेकिन क्या धन से सुख खरीदा जा सकता है? क्या हर धनवान व्यक्ति सुखी है? आखिर इंसान सुख पाने के लिए ही तो धन कमाना चाहता है, पर कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस धन के पीछे जान छोड़कर हर कोई भाग रहा है, वही सुख का दुश्मन हो? आज की कहानी यही बताती है कि कैसे पैसा कमाने की धुन जीवन के सुख को खत्म कर देती है।
तो आइए, एक सुंदर कथा का आनंद उठाते हैं....
किसी नगर में एक सेठ रहते थे। उनके पास अपार संपत्ति, कोठी, घोड़ा-गाड़ी यानी सुख का हर वह सामान था, जिसकी हर कोई कामना करता है। कोई चीज नहीं थी, तो वह था सुख-चैन। उनके मन में हमेशा बेचैनी बनी रहती थी। बड़ी सी कोठी में सेठ-सेठानी ही रहते थे। बच्चे विदेश में रहते थे। उनके घर के ठीक सामने मजदूरों का एक परिवार रहता था। उस परिवार में 6 सदस्य थे, घर में धन की कमी थी, दोनों समय भोजन की ही ठीक व्यवस्था हो पाती थी, इतनी उस घर की कमाई थी। इसके बावजूद उस घर से हमेशा ठहाकों की आवाज सुनाई पड़ती थी। रोज शाम को परिवार के सदस्य एक साथ घर पर जमा होते, महिला खाना बनाती और साथ में शुरू होता हंसी ठहाकों का दौर। सब हंसते-गाते, जम कर खाना खाकर सो जाते।
सेठ के घर एक संत आए
सेठ जी अक्सर अपनी सेठानी के साथ शाम के समय छत पर आते और इस परिवार की खुशियों को महसूस करते। उस समय उनको अपने दुख और अधिक सालने लगते। एक दिन सेठ के घर एक संत आए। उनके भोजन सत्कार के बाद सेठ उन्हें लेकर छत पर आए। उन्होंने भी सामने हंसता-खेलता परिवार देखा और सुखी हुए। तब सेठ ने उनसे पूछा कि हम धनवान होकर भी सुखी नहीं हैं और ये लोग गरीब होकर भी इतने सुख से जी रहे हैं। इसका कारण क्या है? संत ने कहा कि तुम निन्यानवे के फेर में पड़े हो। यही फेर सब सुख हर लेता है। सेठ सहमत ना हुए तो संत ने कहा कि इनकी छत पर 99 रूपये की एक थैली फेंक दो और देखो तमाशा।
परिवार ने अपने खान-पान में कटौती चालू कर दी
उसी रात सेठ ने थैली फेंक दी। दूसरे दिन वो थैली मजदूर को मिल गई। इतना धन पाकर वह बौखला गया और फिर उसके मन मे धन जमा करने की लालसा जागी। उसने अपनी पत्नी से कहा कि अगर हम एक रूपया और जोड़ लें तो पूरा सैकड़ा जमा हो जाएगा, जो भविष्य में काम आएगा। इसके साथ ही उस परिवार ने अपने खान-पान में कटौती चालू कर दी। पहले जिस रसोई की सुगंध आस-पास वालों की भी भूख जगा देती थी, अब सूनी हो गई। एक रूपया जमा होने के बाद एक और, एक और का सिलसिला चालू हो गया, शाम को जमा होने वाले परिवार के सदस्य रूपया कमाने के लिए देर रात तक घर आने लगे। हंसी-ठहाके अब उस घर से विदा हो गए थे। हां, पैसा जरूर जमा होने लगा था, पर भविष्य के चक्कर में वह परिवार वर्तमान की खुशियां खो चुका था। एक महीने बाद संत फिर आए, उस परिवार को देखा और फिर सेठ को देख कर मुस्कुराए। सेठ ने हाथ जोड़ लिए और मान गए कि धन का अत्यधिक मोह ही सारे दुख की जड़ है।
धन से जरूरत पूरी होती है लेकिन सुख नहीं मिलता
तो देखा आपने, धन जीवनयापन के लिए आवश्यक है, पर जीवन को सुखी बनाने के लिए नहीं। जीवन को सुखी बनाता है अपनों का साथ, अपनों के साथ बिताया गया सुंदर समय। धन का अपना महत्व है, पर धन जीवन के सुख की जगह नहीं ले सकता। तो आज से ही परिवार के साथ अच्छा और अधिक समय बिताइए, ताकि बाद में अफसोस ना रह जाए।












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