Motivational Story: भावना ग्रहण करते हैं प्रभु, धन नहीं

नई दिल्ली। संसार है, तो प्रदर्शन है और अपने आपको सबसे बढ़कर दिखाने का चलन आजकल इतना बढ़ गया है कि धर्म भी इससे अछूता नहीं रह गया। देखा जाए, तो आज सच्ची भक्ति कहीं खो गई है और धर्म का प्रदर्शन हावी हो गया है। कौन कितना भव्य आयोजन करवाता है, कितना सोना-चांदी चढ़ाता है, कितने लोगों को भव्य भोज करवाता है, यही देखने और चर्चा का विषय हो गया है। जिन भगवान को पूजना है, उनके प्रति भावना तो पीछे छूट जाती है और प्रदर्शन और प्रशंसा का वर्चस्व हो जाता है। लेकिन क्या वह अंतर्यामी भी इस सोने- चांदी की चमक- दमक से प्रभावित होते हैं?

Motivational Story: भावना ग्रहण करते हैं प्रभु, धन नहीं

आइए, श्री कृष्ण के एक सुंदर प्रसंग से जानते हैं

एक बार श्री कृष्ण की प्रिय पत्नी सत्यभामा के हृदय में अपने पति को लेकर एक अद्भुत विचार आया। उन्होंने सोचा कि क्यों ना श्री कृष्ण को सोने-चांदी के गहनों से तौला जाए। सत्यभामा के पास गहनों का अथाह भंडार था। उन्होंने सोचा कि इस तरह मैं श्री कृष्ण को दिखा पाउंगी कि मेरा प्रेम ही सबसे गहरा है। श्री कृष्ण ठहरे अंतर्यामी, वे तुरंत ही सत्यभामा के मन की बात समझ गए और उन्हें अनुमति दे दी। सत्यभामा अपने प्रेम और धन का प्रदर्शन सबके सामने करना चाहती थीं, इसीलिए उन्होंने पूरी प्रजा को इस तौल को देखने के लिए आमंत्रित किया।

दूसरे पलड़े पर सत्यभामा ने अपने गहने रखना प्रारंभ किए

नियत समय पर श्री कृष्ण तराजू के एक पलड़े पर बैठ गए और दूसरे पलड़े पर सत्यभामा ने अपने गहने रखना प्रारंभ किए। सत्यभामा अपने गहने रखती चली गईं, पर पलड़ा ना झुका। सत्यभामा के सब गहने समाप्त हो गए, तो उन्हें चिंतित देख सभी रानियां अपने गहने ले आईं और दूसरे पलड़े पर रख दिए, परंतु रंच मात्र भी अंतर ना पड़ा। इधर, रानियों का चेहरा चिंता और उदासी से ढलता जाता था, उधर श्री कृष्ण के अधरों पर रहस्यमयी मुस्कान बढ़ती जाती थी। धीरे-धीरे यह खबर पूरे राज्य में फैल गई। सारी प्रजा यह जानने को उत्सुक थी कि महाराज आज तौले जा सकेंगे अथवा नहीं ? क्या कारण है कि अथाह स्वर्ण भंडार भी श्री कृष्ण की बराबरी करने में सफल नहीं हो पा रहा। सभी यह तो समझ गए थे कि लीलाधर की कोई लीला अवश्य है। कुछ तो संदेश है, जो भगवान आज हमें देना चाहते हैं।

सत्यभामा की इच्छा पूरी ना हो सकी

सभी तरह के प्रयास करने के बाद भी जब सत्यभामा की इच्छा पूरी ना हो सकी, तब उसने थककर हाथ जोड़ लिए और प्रार्थना की कि हे प्रभु! आप ही हमें इस समस्या से पार पाने का उपाय बताएं। तब श्री कृष्ण ने कहा कि मेरे कक्ष में गुलाब का एक फूल रखा है, जो मुझे राधा ने दिया था। आप उसे ले आएं और पलड़े पर रख दें। सत्यभामा ने यही किया और देखते ही देखते श्री कृष्ण का पलड़ा झुक गया।

हे भक्तों! मैं तुम्हारी भावना का भूखा हूं

इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि हे भक्तों! मैं तुम्हारी भावना का भूखा हूं, तुम्हारे धन का नहीं। मेरी दृष्टि में धन का कोई महत्व नहीं है। मेरा जो भक्त मुझे सच्ची भावना से पुकारता है, हृदय से प्रेम करता है, मैं उसकी तरफ खिंचा चला जाता हूं। असल में मैं स्वयं अपने भक्त के प्रेम का दास हूं। कोई भक्त मुझे क्या अर्पित करता है, यह मेरे लिए मायने नहीं रखता, बल्कि वह कितने प्रेम और समर्पण से मुझे पुकार रहा है, केवल यही भावना मुझे परम प्रिय है।

दंभ है, स्वयं से किया छलावा है...

तो देखा दोस्तों, मुख्य बात यह नहीं कि हम पूजा- पाठ में कितना खर्च कर सकते हैं। यह तो केवल हमारी प्रदर्शन प्रियता है, दंभ है, स्वयं से किया छलावा है। यदि उस गिरधारी का प्रेम पाना है, तो प्रेम से पुकारना ही पर्याप्त है।

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