Mahashivratri 2020: शिव के लिए बनाई गई थी सोने की लंका

नई दिल्ली। भारतीय पौराणिक कथाओं में रावण की सोने की लंका सर्वविदित है। भारतीय जनमानस का प्राण माने जाने वाले महाग्रंथ रामायण को जानने वाला हर व्यक्ति, भगवान राम का हर भक्त रावण और उसकी सोने की लंका से परिचित है। इस तथ्य से भी काफी लोग परिचित हैं कि सोने की लंका कुबेर की थी और कालांतर में उसके सौतेले भाई रावण ने उससे यह सोने की नगरी छीन ली थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लंका नगरी वास्तव में भगवान महादेव के लिए बनाई गई थी। आज यही रोचक कथा सुनते हैं और जानते हैं कि औघड़ बाबा महादेव के लिए आखिर कैसे सोने की नगरी का निर्माण हुआ।

माता पार्वती और महादेव का विवाह हो चुका था...

माता पार्वती और महादेव का विवाह हो चुका था...

यह बात उस समय की है, जब माता पार्वती और महादेव का विवाह हो चुका था। एक बार माता पार्वती ने विचार किया कि सारे देवता बड़े-बड़े महलों में रहते हैं, जबकि महादेव देवों के देव होने के बावजूद पर्वतों में रहकर जीवन काट रहे हैं। उन्होंने भगवान शिव से यह बात कही और उनसे एक विशाल महल बनवाने के लिए कहा। शिव जी ने बहुत समझाया कि हमारे लिए यह पर्वत ही ठीक हैं, महल हमारे लिए सही नहीं है, पर पार्वती जी ने जिद पकड़ ली। पार्वती जी की जिद पर शिव जी ने आखिर विश्वकर्मा जी को बुलाया और उनसे किसी ऐसे स्थान पर महल बनाने को कहा, जहां उनकी तप साधना में भी कोई व्यवधान ना आए।

तीन सुंदर पहाडि़यों का चयन किया गया

तीन सुंदर पहाडि़यों का चयन किया गया

शिव जी की तप साधना को ध्यान में रखते हुए विश्वकर्मा जी ने समुद्र के बीचों बीच तीन सुंदर पहाडि़यों का चयन किया, जहां तक किसी का भी पहुंचना आसान ना था। इस स्थान पर विश्वकर्मा जी ने पूरा मन लगाकर शिव जी के महात्म्य के अनुरूप सोने की नगरी बसा दी। सोने का विशाल महल बना, जिसकी शोभा अवर्णनीय थी। इस पूरे निर्माण को देखकर पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने स्वर्ण नगरी के उद्यापन के लिए यज्ञ का आयोजन किया। इसमें समस्त देवताओं को आमंत्रित किया गया और यज्ञ का आचार्य महर्षि विश्रवा को बनाया गया। उचित समय पर समस्त पूजा विधान संपन्न होने के बाद शिव जी ने आचार्य विश्रवा से पूछा कि दक्षिणा के रूप में वे क्या चाहते हैं? देवयोग से ऋषि विश्रवा के मन में लोभ आ गया और उन्होंने दक्षिणा में सोने की नगरी ही मांग ली। भोलेनाथ तो ठहरे भोले बाबा, उन्होंने चिश्रवा जी को तुरंत ही वह नगरी दे डाली।

 'तुमने मेरे भोले पति को ठग कर स्वर्ण नगरी हथिया ली'

'तुमने मेरे भोले पति को ठग कर स्वर्ण नगरी हथिया ली'

इस पूरे घटनाक्रम से पार्वती जी क्षुब्ध हो गईं और उन्होंने विश्रवा को श्राप दिया कि तुमने मेरे भोले पति को ठग कर स्वर्ण नगरी हथिया ली है, लेकिन तुम सुखी नहीं रहोगे। मेरे पति का ही एक अवतार तुम्हारी स्वर्ण नगरी को जला कर राख कर देगा और इसके साथ ही तुम्हारे कुल का नाश प्रारंभ हो जाएगा। तुम्हारे लालच की कीमत पूरे कुल को चुकानी पड़ेगी।

बेटे कुबेर को सोने की लंका दे दी


कालांतर में विश्रवा ने अपनी पहली पत्नी से उत्पन्न हुए बेटे कुबेर को सोने की लंका दे दी। विश्रवा की दूसरी पत्नी राक्षस कुल की कन्या थी। उससे विश्रवा की चार संतानें हुईं रावण, कुंभकर्ण, विभीषण और शूर्पणखा। रावण ने बड़े होकर कुबेर से लंका छीन ली। रावण ने जब सीता जी का अपहरण कर लिया, तब हनुमान जी उन्हें भगवान राम का संदेश देने लंका पहुंचे और सोने की लंका जला डाली। हनुमान जी भगवान शिव का ही अवतार माने जाते हैं। लंका के जलने के बाद शीघ्र ही कुंभकर्ण और रावण मारे गए। विभीषण भगवान राम की शरण में आने के कारण सुरक्षित रहे।

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