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शास्त्रों में बताए नियम के अनुसार करेंगे भोजन तो रहेंगे स्वस्थ और सुखी

नई दिल्ली। हमारे प्राचीन धर्म शास्त्रों में स्वस्थ और सुखी जीवन जीने के लिए कई तरह के नियम बताए गए हैं। उनमें से सबसे महत्वपूर्ण भोजन करने के नियम। अधिकांश लोग भोजन करने के नियम को नहीं मानते हैं, जिसे जहां जगह जैसी जगह मिली वह भोजन करने बैठ जाता है। जबकि शास्त्रों में भोजन करने के समय, दिशा, स्थान जैसी अनेक बातों के स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं।

आइए जानते हैं क्या हैं वे नियम...

हिंदू शास्त्रीय मान्यताओं में भोजन की सात्विकता को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। भोजन शुद्ध होना चाहिए, उससे भी शुद्ध जल होना चाहिए और सबसे शुद्ध वायु होना चाहिए। यदि यह तीनों शुद्ध हैं तो व्यक्ति दीर्घायु होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि शास्त्रीय नियमों के अनुसार भोजन करेंगे तो लंबी उम्र पाई जा सकती है।

भोजन करने से पूर्व अपने शरीर के पांच अंगों को स्वच्छ रखना चाहिए

भोजन करने से पूर्व अपने शरीर के पांच अंगों को स्वच्छ रखना चाहिए

  • भोजन करने से पूर्व अपने शरीर के पांच अंगों को स्वच्छ रखना चाहिए। वे हैं दोनों हाथ, दोनों पैर और मुंह। इन पांचों अंगों को साफ करके ही भोजन करने बैठना चाहिए।
  • खाना शुरू करने से पहले ईश्वर का ध्यान करना और उन्हें धन्यवाद कहना कि उन्होंने हमें भोजन करने का सुख प्रदान किया है। साथ ही प्रार्थना कि संसार के समस्त भूखों को भोजन प्राप्त हो।
  • खाना तो रसोईघर में बनता ही है, लेकिन भोजन को ग्रहण भी रसोईघर में ही करना चाहिए।
  • पूरे परिवार को साथ मिल बैठकर ही भोजन करना चाहिए

    पूरे परिवार को साथ मिल बैठकर ही भोजन करना चाहिए

    • पूरे परिवार को साथ मिल बैठकर ही भोजन करना चाहिए। अलग-अलग भोजन करने से परिवारिक सदस्यों में प्रेम और एकता कायम नहीं हो पाती।
    • प्रात: और सायं ही भोजन का विधान है, क्योंकि पाचनक्रिया की जठराग्नि सूर्योदय से 2 घंटे बाद तक एवं सूर्यास्त से 2.30 घंटे पहले तक प्रबल रहती है। शास्त्रों की मानें तो जो व्यक्ति सिर्फ एक समय भोजन करता है वह योगी और जो दो समय करता है वह भोगी कहा गया है।
    • भोजन हमेशा पूर्व और उत्तर दिशा की ओर करें

      भोजन हमेशा पूर्व और उत्तर दिशा की ओर करें

      • भोजन हमेशा पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुंह करके ही करना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है। तथा पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है।
      • भोजन करते समय हमेशा मौन रहें। यदि किन्हीं कारणों से बोलना जरूरी हो तो सिर्फ सकारात्मक बातें ही करें। भोजन करते समय किसी भी प्रकार की समस्या पर चर्चा न करें। भोजन को खुशी से और पूरा चबा-चबाकर ही खाएं।
      • भोजन में स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें। एक-दूसरे का जूठा भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। इससे रोगों में वृद्धि होती है। भाग्य प्रभावित होता है।
      • तीन प्रहर (9 घंटे) से अधिक पुराना भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए

        तीन प्रहर (9 घंटे) से अधिक पुराना भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए

        • तीन प्रहर (9 घंटे) से अधिक पुराना भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। तीन प्रहर से अधिक बासी भोजन मनुष्यों के लिए त्याज्य है। इसे पशुओं को दे देना चाहिए।
        • भोजन के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए । भोजन के तुरंत बाद घुड़सवारी, दौड़ना, बैठना, शौच आदि नहीं करना चाहिए। यह कारण चिकित्सीय दुनिया के हिसाब से भी सही माने जाते हैं।
        • भोजन के पश्चात दिन में टहलना एवं रात में सौ कदम टहलकर बाईं करवट लेटने अथवा वज्रासन में बैठने से भोजन का पाचन अच्छा होता है। भोजन के एक घंटे पश्चात मीठा दूध एवं फल खाने से भोजन का पाचन अच्छा होता है।
        • भोजन बनाने वाले के लिए नियम

          भोजन बनाने वाले के लिए नियम

          • भोजन बनाने वाले को स्नान करने के बाद ही भोजन बनाना प्रारंभ करना चाहिए।
          • भोजन बनाने वाले का मन भी पवित्र हो। अर्थात वह अच्छी भावना से भोजन बनाए।
          • भोजन बनाने के बाद तीन रोटियां अग्निदेव को समर्पित करने के लिए अलग निकाल लेनी चाहिए। बाद में इसे गाय, कुत्ते और कौवे को डाल दें।

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