जानिए क्या है गुरू चाण्डाल योग ?
लखनऊ(पं.अनुज के शुक्ल)। गुरू देवता का गुरू है और राहु राक्षस। इन दोनों का किसी भी प्रकार से सम्बन्ध होने पर चाण्डाल योग निर्माण होता है। गुरू का जब राहु से सम्बन्ध होता है तो गुरू अपने देवत्व का बचाने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहता है, किन्तु राहु अपनी दुष्टता के कारण गुरू को पथ भ्रष्ट करने के लिए षडयन्त्र रचता रहता है।
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जिस जातक की कुण्डली में चाण्डाल योग होता है, उसे राहु अनैतिक कार्यो की ओर प्रेरित करता है। जैसे-छल-कपट, धूर्तता, चोरी, चरित्रहीनता, शराब, धूम्रपान, दूसरों को यूज करना, अचानक राक्षस का रूप धारण कर लेना, अनैतिक रूप से धन अर्जन करना, हिंसक व्यवहार करना आदि।
चाण्डाल योग के दुष्प्रभाव
- कुण्डली में राहु और गुरू का किसी भी प्रकार सम्बन्ध होने से शिष्य गुरू के प्रति समर्पित न रहकर ईष्र्या का भाव रखता है।
- यदि राहु बलशाली हो तो शिष्य गुरू के कार्य को ही अपनाता है किन्तु गुरू के सिद्धान्तों का खंडन करता है। सबके सामने गुरू का अपमान भी कर देता है।
- यदि राहु बहुत शक्तिशाली नहीं है तो शिष्य अपने गुरू का सम्मान करता हैं। ऐसा जातक दूसरों के लेखन को चुराकर अपना सिद्ध करता है।
- बहुत कम प्रतिशत में गुरू का प्रभाव राहु के दुष्प्रभाव को कम कर पाता है। इस योग का सर्वाधिक असर तब दिखता है, जब दो भावों में बैठे हुये राहु और गुरू एक-दूसरे पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालते हो।
- जब गुरू और राहु एक-दूसरे से सप्तम स्थान में हो एंव गुरू के साथ केतु बैठा हो तो गुरू के शुभ फल को प्राप्त कराने में केतु अहम भूमिका अदा करता है।
- केतु भोग विलासिता दूर बुद्धि या मानसिक विलासिता के पक्षधर है।
- इस योग से प्रभावित लोगों को स्पष्ट विचारों में कठिनाईयां आती है। कार्यो में बाधायें आने से निराशा बनी रहती है।
- अनैतिक कर्मो की ओर अग्रसर होना एंव दोषपूर्ण निर्णय लेना।
- घर में कलह का वातावरण बना रहना एंव वैवाहिक जीवन में बहुत उथल-पुथल रहती है।













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