वटसावित्री व्रत यानी सुहाग की लंबी उम्र की कामना

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व्रत और त्यौहार मनुष्य के स्वास्थ्य एंव समाज की अमूल्य चीजों को सुरक्षित रखने के लिए बनायें गये है और इन्हे धर्म से इसलिए जोड़ दिया गया है, ताकि लोग आस्था व विश्वास की डोर से इन्हे बांधें रखें। भारत में प्रत्येक ऋतु आने से पूर्व उसकी आराधना, स्तुति एंव सत्कार किया जाता है। यही हमारे संस्कारों की संस्कृति है। वर्षा ऋतु प्रारम्भ होने से पूर्व वट्सावित्री पूजन एंव व्रत का विधान है।

इसमें वट्वृक्ष यानि बरगद पेड़ की पूजा की जाती है। विज्ञान द्वारा मान्यता प्राप्त है कि बरगद् और पीपल के पेड़ से 24 घन्टे आक्सीजन निकलती है। यदि वृक्षों को पूजा जायेगा तो शायद उन्हे समाप्त न किया जाये और वृक्षों के बचे रहने से हमें पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन मिलेगी एंव अधिक से अधिक वर्षा होगी जिसके परिणाम स्वरूप कृषि की पैदावर में वृद्धि होगी और कृषि प्रधान हमारा भारत देश समृद्धशाली बनेगा।

शायद इसी उद्देश्य से हमारे मनीषियों ने वृक्षों की रक्षा के लिए वटसावित्री त्यौहार का सजृन किया होगा। मेरे विचार से यदि वट्सावित्री त्यौहार को पर्यावरण दिवस के रूप में घोषित कर दिया जाये तो वृक्षों के जीवन पर मड़राते संकट कुछ कम हो सकते है क्योंकि धर्म से जुड़ी चीजें परम्परायें बनती है और परम्परायें कभी भी समाप्त नहीं होती है।

ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट्सावित्री व्रत करने का विधान है। उत्तर भारत में ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या तक और दक्षिण भारत में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक व्रत रखने का प्रावधान है। लेकिन अधिकतर लोग केवल अमावस्या या पूर्णिमा को ही व्रत रखते है। इस व्रत में वटवृक्ष का पूजन होता है और सावित्री और सत्यवान की कथा का श्रवण किया जाता है। इसी वजह से इसका नाम वट्सावित्री है। बोलचाल की भाषा में इसे बरसाईत भी कहते है।

व्रत का विधान- सधवा स्त्री को त्रयोदशी के दिन अपने नित्यकर्म से निवृत होने के बाद आंवले से अपने बालों को धोयें। जल से संकल्प ले कि मैं जन्म-जन्मान्तर में कभी विधवा न हो जाउॅ। तत्पश्चात वटवृक्ष में सूत लपेट कर गन्ध, अक्षत, पुष्प आदि से पूजन कर वट्वृक्ष की कम से कम 7 बार परिक्रमा करें एंव इनके पत्तों की माला बनाकर पहनें।

इसके बाद अपनी सामर्थ के अनुसार सावित्री व सत्यवान की मूर्ति स्थापित करें। तीन रात्रि उपवास करके चैथे दिन चन्द्रमा को अध्र्य देने के बाद सावित्री का पूजन कर ब्राहम्णों को भोजन कराके यथा शक्ति दक्षिणा दें। पूजन की सामग्री के साथ एक सोहाग की पीटारी या डिब्बी ब्रहाम्ण को दे देनी चाहिए। तत्पश्चात चने पर एक रूपया रखकर अपनी सास को प्रणाम करें जिससे सास व बहु के रिश्तों में मधुरता बनी रहती है।

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