सुवेंदु के भाई शादीशुदा पर वो क्यों कुंवारे? पिता ब्याह ना करने की वजह से थे गुस्सा,घरवाले डरते थे बेटा कहीं..
Why Suvendu Adhikari is Unmarried: 9 मई 2026 की सुबह पश्चिम बंगाल के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गई है। सुवेंदु अधिकारी ने ईश्वर के नाम पर बांग्ला भाषा में शपथ लेकर राज्य के पहले बीजेपी मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाल ली है। शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, जिसने उनकी विनम्रता और संस्कारों की झलक पेश की।
लेकिन इस ऐतिहासिक जीत और राजनीतिक ऊंचाइयों के बीच, एक सवाल अक्सर लोसुवेंदु गों के जेहन में कौंधता है- सुवेंदु अधिकारी ने शादी क्यों नहीं की? सुवेंदु के भाइयों की शादी हो गई, उनका परिवार बस गया, लेकिन 55 साल की उम्र में भी सुवेंदु कुंवारे क्यों हैं? आखिर उन्होंने अपना घर क्यों नहीं बसाया?

जब भरी सभा में सुवेंदु ने खुद खोला अपनी 'बैचलर लाइफ' का राज (Why Suvendu stays unmarried)
करीब छह साल पहले हल्दिया की एक जनसभा में सुवेंदु अधिकारी अपने पूरे रौ में थे। उन्होंने खुद माइक पर वो सवाल उठाया जो हर कोई उनसे पूछना चाहता था। सुवेंदु ने कहा, "कई लोग मुझसे पूछते हैं कि सुवेंदु , तुम्हारे भाई शादीशुदा हैं, तो तुम अविवाहित क्यों हो?"
उस वक्त उन्होंने जो जवाब दिया, उसने लाखों बंगालियों का दिल जीत लिया। सुवेंदु ने स्पष्ट किया कि उनकी नजर में वह अकेले नहीं हैं। उन्होंने कहा, "मेरा परिवार केवल पांच या आठ सदस्यों का नहीं है, पूरा बंगाल मेरा परिवार है। समाज के लिए सब कुछ न्योछावर करना पड़ता है।" उन्होंने बंगाल के महान स्वतंत्रता सेनानियों सतीश सामंता और सुशील धारा का जिक्र करते हुए बताया कि उन्हीं के आदर्शों पर चलते हुए उन्होंने ताउम्र अविवाहित रहकर जनता की सेवा करने का कठिन फैसला लिया है।
शादी न करने पर पिता की डांट: 'यह यश और पैसा कहां जाएगा?' (Father Shishir Adhikari got angry)
सुवेंदु का यह फैसला उनके पिता और दिग्गज नेता शिशिर अधिकारी को आसानी से हजम नहीं हुआ था। एक पिता के तौर पर शिशिर चाहते थे कि उनका बेटा भी अपना घर बसाए। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपना दर्द साझा करते हुए बताया था कि उन्होंने सुवेंदु को इस बात पर जमकर डांटा था।
शिशिर अधिकारी ने कहा था, "मैंने उसे गुस्से में बहुत डांटा था, हालांकि बाद में मुझे बुरा भी लगा। गांव के परिवेश में हर कोई यही सोचता है कि बच्चा बड़ा होगा, उसकी शादी होगी और उसका अपना एक संसार होगा। मैंने उसे डांटते हुए पूछा था कि यह सब इज्जत, यश और पैसा किसके लिए है? अगर तुम्हारा अपना परिवार ही नहीं होगा, तो यह सब कहां जाएगा?" लेकिन सुवेंदु अपने इरादे के पक्के थे और उन्होंने अपनी जिद नहीं छोड़ी।

सन्यासी बनने का डर और रामकृष्ण मिशन से लगाव
सुवेंदु अधिकारी का झुकाव बचपन से ही अध्यात्म और धर्म की ओर रहा है। 1970 में पूर्व मेदिनीपुर के कोंतली गांव में जन्मे सुवेंदु बचपन में इतने धार्मिक थे कि उनके माता-पिता को एक अलग ही डर सताने लगा था। उन्हें लगता था कि उनका बेटा कहीं सन्यासी न बन जाए और घर छोड़कर हमेशा के लिए चला न जाए।
हर शनिवार रामकृष्ण मिशन जाना उनका तय नियम था। वह इतने निस्वार्थ थे कि घर में जमा सिक्के भी चुपचाप ले जाकर मिशन में दान कर आते थे। घरवालों को हमेशा यह अंदेशा रहता था कि वह किसी भी दिन वैराग्य धारण कर सकते हैं। हालांकि, सुवेंदु ने संन्यास तो नहीं लिया, लेकिन 'राजनीतिक संन्यास' का रास्ता जरूर चुन लिया, जहां परिवार की मोह-माया से ऊपर उठकर केवल लोक कल्याण ही उनका लक्ष्य बन गया।
स्वतंत्रता सेनानियों का प्रभाव और 'सिंगल' होने के फायदे
सुवेंदु ने एक बार खुलकर बताया था कि 1987 में जब वे छात्र राजनीति में आए, तभी से वे पूरी तरह से जनसेवा के प्रति समर्पित हो गए थे। उन्होंने अपने क्षेत्र के तीन महान नायकों- सतीश सामंता, सुशील धारा और अजय मुखर्जी का उदाहरण दिया। ये तीनों महान स्वतंत्रता सेनानी अविवाहित थे। सुवेंदु ने उन्हीं के नक्शेकदम पर चलने का प्रण लिया।
उनके मुताबिक, अविवाहित रहने का एक बहुत बड़ा पॉजिटिव साइन यह है कि उन्हें काम करने के लिए भरपूर समय मिलता है। उनके पीछे कोई पारिवारिक जिम्मेदारी नहीं है, जिससे वे 24 घंटे जनता के लिए उपलब्ध रह सकते हैं। उन्होंने चुटकी लेते हुए यह भी कहा था कि "घर के सदस्यों को राजनीति में लाना या सत्ता का गलत इस्तेमाल करना एक बड़ी कमी है, मैं अविवाहित हूं इसलिए इन सब झंझटों से दूर और ठीक हूं।"

छात्र राजनीति से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर
80 के दशक के उत्तरार्ध में कांथी के प्रभात कुमार कॉलेज से शुरू हुआ सुवेंदु का सफर आज अपनी मंजिल पर पहुंच गया है। पूर्व मेदिनीपुर में अपनी जमीन तैयार करने वाले सुवेंदु ने ममता बनर्जी जैसी कद्दावर नेता को हराकर खुद को 'जायंट किलर' साबित किया है।
आज जब वे बंगाल के मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके हैं, तो उनकी यह 'बैचलर' इमेज उनकी ताकत बन गई है। जनता उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देख रही है जिसके पास खोने के लिए अपना परिवार नहीं, बल्कि पाने के लिए पूरा बंगाल है। सन्यासी बनने की राह पर चलने वाला वो बालक आज एक आधुनिक राज्य का 'सारथी' बन चुका है। अब देखना यह है कि अपनी इस 'डेडिकेटेड लाइफ' के दम पर वे बंगाल की तकदीर कैसे बदलते हैं।














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