peanut farming : मूंगफली से मालामाल होंगे किसान, जून में बुआई, अक्टूबर में फसल तैयार
मूंगफली की खेती चार महीनों की फसल है। जून में बुआई के बाद अक्टूबर तक फसल तैयार। कम पानी में होने वाली इस खेती में मुनाफे का बड़ा स्कोप है। पढ़िए रिपोर्ट
नई दिल्ली, 08 जून : मॉनसून सीजन की शुरुआत होने के बाद खरीफ फसलों की बुवाई बड़े पैमाने पर की जाती है। कई किसान इस मौसम में मूंगफली की खेती (peanut farming) भी करते हैं। कुछ इलाकों में इसे बादाम भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पीनट कहा जाता है। पीनट कल्टीवेशन किसानों के बीच लोकप्रिय हो रहा है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक देश है। एक प्रमुख खरीफ फसल के रूप में मशहूर मूंगफली 'गरीबों के काजू' के नाम से भी मशहूर है। मूंगफली की खेती करने वाले किसानों को कुछ महीनों में ही लाखों रुपए की आमदनी होती है।

चार महीने में बदलेगी किसानों की किस्मत !
खेती-किसानी की समझ रखने वाले लोगों के मुताबिक मूंगफली की खेती करने वाले गरीब किसानों की किस्मत 4 महीने में बदल सकती है। हालांकि, मूंगफली की खेती सही तकनीक पर भी निर्भर है। इसलिए मूंगफली की खेती करने वाले किसानों को खरीफ सीजन में बुवाई के समय, मिट्टी में उर्वरक की जरूरत, सिंचाई और कीट प्रबंधन जैसी कुछ अहम बातों का ध्यान रखना चाहिए।

इन राज्यों में मूंगफली की खेती
मूंगफली उपजाने वाले किसान गुजरात, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर मिलते हैं। इन राज्यों की खरीफ फसल में मूंगफली बड़े पैमाने पर बोई जाती है।

उन्नत बीज और आधुनिक तकनीक का संतुलन
मूंगफली की खेती से अच्छे पैसे कमाने का ख्वाब देख रहे किसानों के लिए यह जरूरी है कि मूंगफली की उन्नत बीज और आधुनिक तकनीक के बीच संतुलन बनाकर पीनट कल्टीवेशन किया जाए। जून में मूंगफली की बुवाई के बाद अक्टूबर तक मूंगफली तैयार हो जाती है। ड्रिप इरीगेशन के कारण इसमें सिंचाई काफी प्रभावी तरीके से होती है। और अक्टूबर-नवंबर में सर्दियों का मौसम शुरू होते होते किसान अच्छे खासे पैसे कमाने लगते हैं।

मिट्टी में नमी जरूरी है
मूंगफली की खेती की तैयारी के बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि खेतों में तीन-चार बार जुताई करनी चाहिए। जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत की मिट्टी बराबर कर लेनी चाहिए। पाटा चलाना इसलिए जरूरी है ताकि मिट्टी में नमी बरकरार रहे।

अच्छी गुणवत्ता के मूंगफली की रोपाई करें
खेत को समतल करने के बाद मिट्टी की जांच करानी चाहिए। जिन पोषक तत्वों की कमी है उस हिसाब से ऑर्गेनिक मैन्योर यानी खाद और अन्य जरूरी चीजें डालें। मिट्टी का उपचार करने से किसान अच्छी गुणवत्ता के मूंगफली अच्छी-खासी मात्रा में भी उपजा सकेंगे।

मूंगफली का बीमारियों से बचाव
खेत तैयार करने के बाद मूंगफली की बुआई के लिए बीजों का भी उपचार करना चाहिए। इससे मूंगफली में कीड़े और दूसरी बीमारियों का अटैक नहीं होता है। क्योंकि मूंगफली एक भूगर्भ फसल है यानी मिट्टी के नीचे पैदा होने वाली फसल है इसमें अच्छी क्वालिटी के बीच चुनने से फसल में बीमारी की संभावना काफी कम हो जाती है और नुकसान की संभावना भी न्यूनतम हो जाती है।

एक हेक्टेयर में कितनी मूंगफली
15 जून से 15 जुलाई के बीच आमतौर से बारिश होती है। खेत की जुताई के बाद पाटा चला कर तैयार रखी गई जमीन पर नमी बनी हो तो मूंगफली की बुवाई इस 1 महीने के दौरान की जा सकती है। अगर मूंगफली की रोपाई एक हेक्टेयर खेत में करनी हो तो इसमें 60 से 70 किलो बीज लगेंगे। किसानों को जितनी ज्यादा जमीन पर रोपाई करनी हो उसके हिसाब से मात्रा कम-ज्यादा होगी।

सिंचाई का सवाल
मूंगफली की फसल में सिंचाई की कम जरूरत पड़ती है। ऐसे में इसकी फसल को वाटर सेवर यानी पानी बचाने वाला भी कहते हैं। मूंगफली की सिंचाई पूरी तरह बारिश पर निर्भर है। कम बारिश होने की स्थिति में किसानों को दूसरे माध्यमों से सिंचाई करनी चाहिए। इसके लिए विशेषज्ञों से भी परामर्श ले सकते हैं। हालांकि, ज्यादा बारिश होने से मूंगफली सड़ने की भी आशंका होती है। मूंगफली की फसल के दौरान खेत में पानी भरने पर अक्सर कीड़े और दूसरी बीमारियों का अटैक होता है। ऐसे में खेतों में पानी निकलने का पर्याप्त इंतजाम बनाना भी जरूरी है।

खरपतवार नियंत्रण
मूंगफली की फसल मिट्टी के नीचे बोई जाती है इसमें कीट रोग और खरपतवार नियंत्रण पर भी ध्यान देना जरूरी है। मूंगफली की फसल में अक्सर खरपतवार निकलते हैं। इससे मूंगफली की उपज यानी क्वांटिटी और क्वालिटी दोनों प्रभावित होती है। पौधे बड़े नहीं होने पर मूंगफली कम मात्रा में पैदा होगी। इसलिए रोपाई के 15 से 30 दिन के बाद मूंगफली के खेतों में निराई गुड़ाई करना चाहिए। बेकार घास को उखाड़ कर फेंक दें। इसके अलावा किसानों को मूंगफली में कीट और दूसरे लोगों की निगरानी भी करनी चाहिए। जिससे 15-15 दिन के अंतराल पर विशेषज्ञों के परामर्श के मुताबिक जैविक कीटनाशक डाले जा सकें।
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