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मालामाल कर देगी मूंग की फसल, अभी है रोपाई का टाइम, किसान सीखें खेती का तरीका

मूंग की खेती कर किसानों को अच्छी आमदनी हो सकती है. खरीफ सीजन में मूंग बड़े पैमाने पर बोई जाती है। सरकार ने मूंग की खरीद के लिए मूल्य समर्थन योजना लागू की है। जानिए जून-जुलाई में मूंग की खेती का तरीका

नई दिल्ली, 16 मई : मूंग की खेती (moong farming) खरीफ सीजन में किसानों को मालामाल कर सकती है। जून-जुलाई का महीना मूंग की रोपाई के लिए आदर्श माना जाता है। सितंबर-अक्टूबर तक फसल की कटाई का भी समय हो जाता है। ऐसे में उन्नत बीजों का इस्तेमाल कर मूंग की खेती करने पर किसानों को लाखों रुपये की कमाई हो सकती है। केंद्र सरकार ने भी मूंग की खरीद मूल्य समर्थन योजना के तहत करने का ऐलान किया है। पंजाब में बड़े पैमाने पर मूंग की खेती होती है। मध्य प्रदेश में भी किसान बड़ी संख्या में दलहनी फसल मूंग की रोपाई करते हैं। वनइंडिया हिंदी की इस रिपोर्ट में जानिए मूंग की खेती से जुड़े कुछ अहम तथ्य

बुआई का सही समय

बुआई का सही समय

खरीफ सीजन में मूंग की बुआई का आदर्श समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह के दौरान माना जाता है। बुआई में देरी होने पर फूल आते समय तापमान बढ़ता है। ऐसे में फलियां कम बनती हैं। तापमान के कारण कई पौधों में फलियां बनती ही नहीं। ऐसे में मूंग की उपज प्रभावित होती है। गर्मियों में बोई जाने वाली मूंग की फसल 15 मार्च तक बो देनी चाहिए। ऐसा करने पर पैदावार अच्छी होती है।

मिट्टी को उपजाऊ बनाती है मूंग

मिट्टी को उपजाऊ बनाती है मूंग

मूंग कम अवधि में तैयार होने वाली दलहनी फसल है। तुअर या अरहर की दो कतारों के बीच मूंग की दो कतारों की बुआई की जा सकती है। मूंग की अन्तरवर्तीय खेती गन्ने के साथ भी की जा सकती है। मूंग के दाने का प्रयोग मुख्य रूप से दाल के लिए होता है। इसमें 24-26 % प्रोटीन, 55-60 % कार्बोहाइड्रेट और फैट यानी वसा 1.3 प्रतिशत होता है। मूंग की फसल से मिट्टी की उर्वराशक्ति भी बढ़ती है। पंजाब में बड़े पैमाने पर मूंग की खेती होती है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के किसान जबलपुर, ग्वालियर, होशंगाबाद और शिवपुरी जिलों में मूंग की फसल अधिक मात्रा में उगाते हैं।

किसान उन्नत बीजों का करें इस्तेमाल

किसान उन्नत बीजों का करें इस्तेमाल

एक अनुमान के मुताबिक मध्य प्रदेश में लगभग 350 किलोग्राम प्रति हेक्टयर मूंग उपजता है। इस औसत उत्पादकता को बढ़ाने के लिए किसानों को उन्नत प्रजातियों के मूंग का चुनाव कर खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक उन्नत बीज से मूंग की पैदावार को 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टयर तक जा सकती है। मूंग की खेती वर्षा ऋतु में की जा सकती है। मूंग की रोपाई के बाद इसके फसल का विकास 25 से 32 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच अच्छे तरीके से होता है। मूंग पकते समय साफ मौसम और 60 फीसद नमी (humidity) होनी चाहिये। पकने के समय बारिश मूंग की फसल का नुकसान करती है।

मूंग की बुआई की तैयारी

मूंग की बुआई की तैयारी

किसी भी फसल की खेती के लिए इलाके की मिट्टी की जांच सबसे जरूरी स्टेप है। वैज्ञानिकों के मुताबिक मूंग की खेती दोमट से बलुअर दोमट मिट्टी में अच्छी होती है। खेत में पानी जमा न होने का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। रोपाई के लिए खेत को तैयार करने के लिए गहरी जुताई करें। बारिश होने पर 2-3 बार और जुताई करें। खरपतवार हटाने के बाद खेत में पाटा चलाकर जमीनी समतल करें। खरीफ सीजन में मूंग की बुआई का सबसे सही समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई का प्रथम सप्ताह होता है।

कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल

कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल

मूंग की फसल को दीमक से बचाने के लिए क्लोरपायरीफॉस रोपाई के लिए खेत तैयार करते समय ही मिट्टी में डालें। मूंग की फसल में बंपर पैदावार के लिए 8 किलो नाइट्रोजन, 20 किलो स्फुर, 8 किलो पोटाश और 8 किलो गंधक (Sulfur) का प्रयोग करना चाहिए। ये पैमाना एक एकड़ में मूंग लगाने के लिए है। किसानों को अपने खेतों में मूंग की रोपाई के समय मिट्टी की जांच के बाद ही उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए।

इतने दिन में पकती है फसल, तुड़ाई का तरीका जानें

इतने दिन में पकती है फसल, तुड़ाई का तरीका जानें

आम तौर पर मूंग की फसल 65 से 70 दिनों में पक जाती है। जून-जुलाई में बोई गई फसल सितंबर-अक्टूबर के पहले सप्ताह तक कट जाती है। फलियां पकने के बाद हल्के भूरे रंग की होती हैं। कुछ फलियां काली भी होती हैं। मूंग की फसल की कटाई की पहचान फलियों का रंग ही है। सभी फलियां एक साथ नहीं पकतीं। ऐसे में फलियों की तुड़ाई हरे से काला रंग होते ही 2-3 बार में करें। बिना पकी हुई फलियों की कटाई करने से दानों की मात्रा और क्वालिटी दोनों खराब होती है।

मूंग की कटाई के बाद सुखाना जरूरी

मूंग की कटाई के बाद सुखाना जरूरी

मूंग की फसल काटने के बाद एक दिन सुखाया जाता है। पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले किसान डंडों से पीट कर मूंग के दाने निकालते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बैलों की मदद से मूंग के दाने अलग किए जाते हैं। विज्ञान का इस्तेमाल कर रहे किसान मूंग और उड़द की कटाई के लिए थ्रेसर का उपयोग करते हैं। मूंग की खेती उन्नत तरीके से करने पर 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की औसत उपज हासिल की जा सकती है। भंडारण से पहले दानों को अच्छी तरह धूप में सुखाने की सलाह दी जाती है। नमी की मात्रा केवल 8 से 10 फीसद रहे, तभी मूंग का भंडारण करना चाहिए।

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