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Unknown Facts About Iran: ईरान के रास्ते ही भारत पहुंची ये 5 चीजें, हिंदुओं की यह शुभ परंपरा भी है ईरानी

Unknown Facts About Iran: भारत और ईरान (प्राचीन फारस) के रिश्ते सिर्फ कूटनीति या सूफी परंपराओं तक सीमित नहीं हैं। हमारी रोजमर्रा के खाने, कपड़ों और सजावट में भी फारसी प्रभाव बड़े पैमाने पर नजर आता है। इतिहासकारों के मुताबिक, सिल्क रूट और मुगल काल के दौरान यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान अपने चरम पर था। भारत से जाने के बाद कुछ समय तक हुमायूं भी ईरान में रहे थे। मुगलों के दौर में भारत के ईरान से करीबी संबंध थे।

ईरान और भारत का संबंध सिर्फ सामाजिक और राजनीतिक नहीं रहा है। संस्कृति और कला से लेकर नक्काशी, खान-पान और सामाजिक जीवन तक में ईरानी प्रभाव आसानी से दिख सकता है। भारत में रहनेवाले पारसी भी मूल रूप से ईरान से ही आए थे।

Unknown Facts About Iran

Unknown Facts About Iran: स्वाद में फारसी तड़का

उत्तर भारत का लोकप्रिय स्नैक समोसा दरअसल फारसी 'संबोसा' से आया। मध्यकालीन इतिहासकार इब्न बतूता ने भी दिल्ली सल्तनत के दरबार में परोसे जाने वाले 'संबूसक' का जिक्र किया है। ईरान में इसमें कीमा और सूखे मेवे भरे जाते थे। भारत आकर यह आलू-भरा शाकाहारी स्नैक बन गया। हालांकि, कई शहरों में आज भी मटन समोसा मिलता है। जलेबी का मूल नाम 'ज़ुल्बिया' या 'जलाबिया' है, जो आज भी ईरान में रमजान के दौरान लोकप्रिय है। खाद्य इतिहासकार के.टी अचाया (K.T. Achaya) ने अपनी किताबों में लिखा है कि यह मिठाई फारसी व्यापारियों के जरिए भारत पहुंची और स्थानीय स्वाद के साथ घुल-मिल गई।

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Iran Food: बिरयानी भी ईरान से भारत आई

बिरयानी शब्द फारसी 'बिरियां' से आया, जिसका अर्थ है 'पकाने से पहले तलना'। इतिहासकार लिजी कॉलिंघम (Lizzie Collingham) के अनुसार, मध्य एशिया और फारस से आए शासकों ने चावल और मांस के इस व्यंजन को भारतीय मसालों के साथ नया रूप दिया। इसी तरह से गुलाबजामुन भी ईरानी मिठाई है। 'गुलाब' शब्द खुद फारसी 'गुल' (फूल) और 'आब' (पानी) से बना है। यह मिठाई मध्य-पूर्वी 'लुकमत-अल-कादी' से प्रभावित मानी जाती है, जिसे भारत में इलायची और केसर की खुशबू के साथ नया स्वाद मिला।

Iran India History: फैशन और कारीगरी में फारसी छाप

मुगल काल में फारसी मूल की नूरजहां ने लखनऊ में चिकनकारी को बढ़ावा दिया। बारीक जाल और फूलों की कढ़ाई वाली यह कला फारसी कलाओं से प्रेरित मानी जाती है। 'ज़र' (सोना) और 'दोज़ी' (कढ़ाई) से बना जरदोजी शब्द खुद इसकी फारसी जड़ों की कहानी कहता है। शाही परिधानों में सोने-चांदी के तारों से की जाने वाली यह कढ़ाई मुगल दरबार की शान बनी। सम्राट अकबर ने ईरान से बुनकरों को बुलाकर आगरा और कश्मीर में कालीन उद्योग को बढ़ावा दिया। फारसी कालीनों की जटिल डिज़ाइन आज भी भारतीय घरों की शान हैं।

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अत्तर और शीशा-कारी

इत्र बनाने की तकनीक और कांच की खूबसूरत शीशियां फारसी परंपरा से आईं। महलों में दिखने वाली 'शीश महल' शैली ईरान की 'आयेने-कारी' कला का भारतीय रूप है।

हिंदुओं के सुहाग चिह्न बन गई ये दो ईरानी चीजें

भारत में आज चूड़ियां और मेहंदी दो ऐसी चीजें हैं, जिसे खास तौर पर सुहागनों का श्रृंगार माना जाता है। भारत में मेहंदी पुरानी परंपरा है, लेकिन जालीदार और फ्लोरल 'अरबिक-पर्शियन' पैटर्न ईरान से प्रभावित हैं। पहले मेहंदी का इस्तेमाल मुगल प्रभाव वाले क्षेत्रों तक ही होता था लेकिन आज लगभग पूरे भारत में मेंहदी के बिना शादी नहीं होती है। इसी तरह से कांच की चूड़ियां भी ईरान के जरिए ही भारत आईं। इसे लाने का श्रेय नूरजहां को दिया जाता है। आज माता की चौकी हो या कोई और आयोजन श्रृंगार में कांच की चूड़ी चढ़ाई जाती है।

इतिहासकारों का मानना है कि भारत और फारस के बीच यह आदान-प्रदान किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि सदियों की व्यापारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक साझेदारी का नतीजा था। यही वजह है कि आज जब हम समोसा खाते हैं, जलेबी का स्वाद लेते हैं या ज़रदोज़ी लहंगा पहनते हैं, तो अनजाने में फारसी विरासत का हिस्सा बन जाते हैं।

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