300 Mango Variety का संरक्षण करने वाले केरल के शंकरन, विलुप्त हो रही प्रजातियों को सहेज रहे किसान
केरल के प्राकृतिक किसान ने विलुप्त होने के कगार पर आम की 300 से अधिक किस्मों का संरक्षण किया है। पलक्कड़ जिले में समर्पित प्राकृतिक किसान, एम शंकरन नंबूदिरी रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल किए बिना आम की 300 वेराइटी का संरक्षण कर रहे हैं।
साढ़े तीन एकड़ के परिसर में आम की 300 से अधिक किस्मों का संरक्षण कर रहे शंकरन बताते हैं कि उनके बागा में कई ऐसे भी फल हैं, जो लुप्त होने की कगार पर थे। संरक्षित आमों में अमेरिका, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, थाईलैंड और मलेशिया से आयात होने वाली किस्में भी शामिल हैं।

फलों के राजा आम की प्रजातियों को सहेजने के बारे में शंकरन कहते हैं कि वे करीब 47 साल से घर पर ही बगीचा डेवलप कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि उनके बाग में उत्तर भारतीय राज्यों और कई देशी केरल की आम की किस्में भी मौजूद हैं।
आम के पौधों को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने विशेष रूप से निर्मित, पर्यावरण-अनुकूल बैगों का इस्तेमाल किया है। युवा पीढ़ी को आम की वेराइटी से परिचित करने के लिए शंकरन ने पौधों पर प्रत्येक किस्म के नाम भी टैग किए हैं।
1976 से ही अपने घर पर बगीचा विकसित कर रहे शंकरन कृषि वैज्ञानिक सुभाष पालेकर की पलक्कड़ यात्रा के बाद जीरो बजट खेती में और शिद्दत से जुटे। उन्होंने कहा, वे अपनी खेती को सुभाष की प्राकृतिक खेती के बराबर मानते हैं। क्षेत्र और जलवायु के आधार पर थोड़ी भिन्नता हो सकती है।
गौरतलब है कि भारत में लगभग 16 देशी आम की किस्मों को भौगोलिक विशेषताओं के कारण जीआई टैग मिला हुआ है। पहले से पंजीकृत छह किस्में GI प्रमाण मिलने की प्रतीक्षा कर रही हैं।
नंबूदिरी ने गर्व से कहा, "मेरे बगीचे में 16 में से कम से कम 10 आम लगे हुए हैं। केरल की 30 से अधिक किस्मों में कोट्टूरकोणम, कुट्टियाट्टूर (केरल से एकमात्र जीआई-प्रमाणित), कट्टापरंबन, अरूर का ओल्लोर, कोझिकोड और कैराली आम नंबूदिरी के बाग में हैं। रानी पसंद, 'कोहितूर' और यूपी चौसा जैसी विदेशी 'पसंद' आम की किस्में भी इनके बाग में हैं।
उन्होंने कहा, "मैंने व्यक्तिगत रूप से पाया है कि इलायची एक ऐसी फसल है जहां कीटनाशकों का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। लेकिन लोग इसे अपने व्यंजनों में स्वाद जोड़ने के लिए दुकानों से खरीदते हैं। मैंने इस परिसर में कुछ इलायची के पौधों की खेती की है और घरेलू खपत में इनका उपयोग करता हूं।"
66 वर्षीय किसान नंबूदिरी ने कहा, जब पूर्व मुख्य सचिव पी के मोहंती 2007 में उनके घर आए तो उनका बाग और खेत देखा। उन्होंने सवाल किया कि क्या शंकरन ने कृषि विज्ञान में डिग्री हासिल की है। उन्होंने कहा, "मैंने उत्तर दिया कि मैंने केवल 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की है। पिछले कुछ दशकों में खेतों और बागान में कड़ी मेहनत से मिले अनुभव के आधार पर वैज्ञानिक खेती के तरीकों को अपनाया।
नंबूदिरी बताते हैं कि मोहंती ने पौधों की हमारी समृद्ध पारंपरिक किस्मों के संरक्षण की जरूरत पर जनता के बीच जागरूकता पैदा करने की सलाह दी। न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, शंकरन के पास एक गौशाला भी है जहां अनंगनमाला कुल्लन और विल्वाधिरी जैसी देशी नस्लों का पालन-पोषण किया जाता है।
गायों की नस्ल पलक्कड़ जिला, कर्नाटक की कृष्णा घाटी और केरल-कर्नाटक सीमा पर पाई जाने वाली कपिला में पाई जाती हैं। गोबर का उपयोग बायोगैस उत्पन्न करने के लिए किया जाता था। एक बड़े तालाब से पंप पानी के साथ मिश्रित घोल का उपयोग पौधों की सिंचाई के लिए किया जाता था।
नंबूदिरी के खेत में लगी फसलों में कॉफी, इलायची, नारियल, सुपारी, नींबू की विभिन्न किस्में, भारतीय बेर (एलांथापाज़म), आम, रामबुटन, भालू सेब, मैंगोस्टीन, ड्रैगन फल, अमरूद और यहां तक कि अंगूर भी शामिल हैं। इनका घर- मारुथेरी मन पारंपरिक तरीके से बना है। हालांकि, दो साल बाद भी यह पूरा नहीं हुआ है।
दीवारें मिट्टी और लेटराइट ईंटों से बनवा रहे किसान नंबूदिरी बताते हैं कि दीवारों को बिना प्लास्टर के छोड़ दिया गया है। घर के खंभे भी ऐसे ही हैं। परिसर की दीवारें भी लेटराइट (मिट्टी) ईंटों से बनी हैं। मध्यम आकार का तीन मंजिला घर गर्मियों के दौरान ठंडा भी रखता है। जिसके लिए टाइल वाली छतों का इस्तेमाल किया गया है।












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