Success Story : 12वीं की पढ़ाई छूटी हौसला नहीं टूटा, अब 20 करोड़ की कंपनी के CEO हैं राजेश

12वीं की पढ़ाई छूटने के बाद बने 20 करोड़ की कंपनी के सीईओ। खेती आधारित बिजनेस में राजेश ओझा की जामुन के फल पर आधारित कंपनी जोवाकी (jamun based Jovaki) की सफलता प्रेरक है। पढ़िए सक्सेस स्टोरी

उदयपुर (राजस्थान), 21 जून : आधुनिक युग में अगर आपकी पढ़ाई छूट जाए तो समाज का एक धड़ा आपको खारिज करने में जरा भी नहीं हिचकिचाता। हालांकि, आलोचनाओं की परवाह किए बिना खुद पर यकीन रखने वाले कुछ उद्यमी ऐसे कारनामे कर दिखाते हैं जो कामयाबी की मिसाल बन जाते हैं। कुछ ऐसी ही सक्सेस स्टोरी है राजेश ओझा की। पढ़िए कैसे 12वीं कक्षा के ड्रॉपआउट छात्र राजेश अब जामुन आधारित एग्रो-फूड कंपनी जोवाकी (jamun based Jovaki) के CEO (मुख्य कार्यकारी अधिकारी) हैं। राजेश की इंस्पायरिंग जर्नी महज एक हजार रुपये और परिवार के समर्थन के साथ शुरू हुई थी। इन्होंने जनजातीय इलाकों को आधुनिक दुनिया के साथ जोड़ने का बीड़ा उठाया है।

आदिवासी महिलाओं की मदद का फैसला

आदिवासी महिलाओं की मदद का फैसला

12वीं कक्षा में पढ़ाई अधूरी छूटने के बाद राजेश ओझा ने 'मायानगरी-मुंबई' जैसा शहर छोड़ राजस्थान के उदयपुर लौटने का फैसला लिया। वे मुंबई नौकरी और पैसे की तलाश में गए थे। वर्तमान में खेती-किसानी से जुड़े काम पर आधारिक एग्रो-फूड कंपनी के CEO राजेश बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें कृषि का बिल्कुल ज्ञान नहीं था। परिवार में भी खेती-किसानी के काम नहीं होते थे। हालांकि, पत्नी पूजा ओझा उनके फैसले के साथ थीं। ऐसे में दोनों ने समाज के वंचित वर्ग - ग्रासिया आदिवासी महिलाओं (Grasiya tribal women) की मदद करने की ठानी। यहीं से शुरू हुई राजेश की उद्यमिता।

Jovaki पांच साल में 20 करोड़ की कंपनी बनी

Jovaki पांच साल में 20 करोड़ की कंपनी बनी

ग्रासिया आदिवासी महिलाओं की मदद कर रहे राजेश ओझा जामुन पर आधारित अनोखा सामाजिक उद्यम मॉडल (Jamun based Social Enterprise Model) के माध्यम से आदिवासी महिलाओं के जीवन में कामयाबी के अध्याय लिख रहे हैं। राजेश ओझा की कंपनी जोवाकी (Rajesh Oza Jovaki) का शाब्दिक अर्थ शिक्षित करना (to enlighten) है। 2017 में शुरू हुई जोवाकी की मार्केट वैल्यू पांच साल के बाद करीब 20 करोड़ आंकी गई है। अनुमान के मुताबिक आगामी दो वर्षों में जोवाकी का बाजार मूल्य 10 गुना बढ़ सकता है। पढ़ाई छूटने के बावजूद सक्सेस और सोशल इंटरप्रेन्योरशिप की मिसाल बने राजेश की सफलता युवा कृषकों और खेती-किसानी आधारित उद्योग करने की चाह रखने वाले युवा उद्यमियों की प्रेरणा बन सकता है।

 पैसों की कमी हुई, आलोचकों को मिला मौका

पैसों की कमी हुई, आलोचकों को मिला मौका

आज एक सफल सीईओ के रूप में कई लोगों की आजीविका के आधार राजेश ओझा शुरुआती दिनों को काफी चैलेंजिंग बताते हैं। राजेश कहते हैं कि उनके पास न तो इतने पैसे थे कि खुद पर खर्च कर सकें। बिजनेस में भी पैसों की तंगी थी। बकौल राजेश, आर्थिक संकट के बीच कई लोगों ने इस बात के लिए आलोचना की, कि उन्होंने कोई मामूली बिजनेस (run-off-the-mill business) का रास्ता क्यों नहीं चुना। खेती आधारित करियर चुनने और सुदूर जंगली इलाकों में रहने का फैसला लेने के कारण उन्हें कई बार खारिज किया गया।

आसान नहीं रहा भरोसा जीतना

आसान नहीं रहा भरोसा जीतना

आदिवासी इलाके में काम करने की चुनौती के बारे में राजेश बताते हैं कि महिलाओं के साथ बात करना और उन्हें भरोसा दिलाना आसान नहीं था। उन्होंने कहा कि एक अनजान शख्स को उनके वनों में पैदा हुए उत्पाद को बेचने के लिए राजी करना लोहे के चने चबाने जैसा था। बकौल, राजेश शुरुआती दिनों में धीमी प्रगति हुई, लेकिन उन्होंने धैर्य बनाए रखा। धीरे-धीरे उनकी सादगी और विनम्रता से लोग प्रभावित हुए। उदयपुर के जनजातीय समुदाय का विश्वास बढ़ा और लोगों के साथ संबंध मजबूत हुए।

सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव का ध्यान

सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव का ध्यान

राजेश ओझा की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज उनकी कंपनी जोवाकी एग्रो फूड्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (Jovaki Agro Food India) 1000 से अधिक आदिवासी परिवारों के लिए आजीविका का स्रोत है। जोवाकी ने दक्षिणी राजस्थान के गांवों में प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना की है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी इसी मॉडल पर काम हो रहा है। जोवाकी महिलाओं को रोजगार देने के अलावा फलों की प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग भी देता है।

प्रोफेशनल्स को मात देने का माद्दा

प्रोफेशनल्स को मात देने का माद्दा

जोवाकी से जुड़ीं आदिवासी महिलाएं कई चरणों में काम करती हैं। इनके कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण का बंदोबस्त किया गया है। क्षमता विकास की दिशा में जोवाकी के काम की बदौलत महिलाएं, कृषि उत्पादों की, पहचान - कटाई - संग्रह - भंडारण - ग्रेडिंग - छंटाई - धुलाई - प्रोसेसिंग और पैकेजिंग जैसे काम खुद करती हैं। खेतों में फसल तैयार होने से लेकर उत्पाद बाजार भेजे जाने तक 9-10 चरणों की ये पूरी प्रक्रिया हुनरमंद आदिवासी महिलाएं खुद करती हैं। काम में लगन और कुशलता इतनी कि किसी बिजनेस स्कूल से पढ़े प्रोफेशनल्स भी मात खा जाएं।

महिलाओं में बंटता है बिजनेस का लाभ

महिलाओं में बंटता है बिजनेस का लाभ

जोवाकी के एक यूनिट में औसतन 70 आदिवासी महिलाएं फलों के प्रसंस्करण से जुड़ी हैं। 150 महिलाएं फलों का संग्रह करती हैं। ऐसे में अलग-अलग प्रोसेसिंग सेंटर चला रहे राजेश ओझा 1000 से अधिक आदिवासी महिलाओं को रोजगार का अवसर मुहैया करा रहे हैं। जोवाकी सुदूर जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदायों तक पहुंचा है। विशेषकर महिलाओं को स्थायी आजीविका मिली है। बिजनेस में लाभ का लगभग 60% आदिवासी महिलाओं के बीच बांटा जाता है। इससे जीवन स्तर बेहतर बन रहा है।

25000 से अधिक परिवारों को अप्रत्यक्ष लाभ

25000 से अधिक परिवारों को अप्रत्यक्ष लाभ

जोवाकी जैसे इनोवेटिव मॉडल ले 25000 से अधिक परिवारों को अप्रत्यक्ष लाभ मिला है। इन परिवारों के लोग सक्रिय रूप से वृक्षारोपण में भाग लेते हैं। इन्हीं परिवारों को लोग उदयपुर में पहले से मौजूद वृक्षों का संरक्षण भी कर रहे हैं। तथाकथित आधुनिक दुनिया से दूर रहने वाले इन परिवारों के लोग जोवाकी से जुड़ने के बाद कई तरह का कौशल सीख चुके हैं। ऐसी ही एक स्किल है बाजार में अपने उत्पाद को उचित कीमत पर बेचना। जोवाकी का दावा है कि अब आदिवासी इलाकों के उत्पादों की बेहतर कीमत मिल रही है।

उदयपुर के इन्वायरमेंट का भी ध्यान

उदयपुर के इन्वायरमेंट का भी ध्यान

जोवाकी की पूरी प्रशिक्षण प्रक्रिया में वन और पर्यावरण संरक्षण का हिस्सा महत्वपूर्ण है। इससे पेड़ों और जंगलों के महत्व के बारे में सामान्य जागरूकता पैदा करने में मदद मिली है। राजेश बताते हैं कि बिजनेस के अलावा उनकी कंपनी उदयपुर क्षेत्र में व्यापक वृक्षारोपण अभियान भी चला रही है। उन्होंने बताया कि शरीफा / सीताफल (Custard Apple) और जामुन के गूदे को बड़े पैमाने पर बर्बाद होते देखने के बाद उनके दिमाग में जोवाकी जैसा इनोवेटिव आइडिया आया और आज नतीजा सामने है।

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