महाराष्ट्र के निकाय चुनाव में बीजेपी की जीत का ये है सीक्रेट, अपनाई कांग्रेस की पुरानी ट्रिक
बीजेपी ने धीरे-धीरे पार्टियों में सेंध लगाई और उनकी मजबूत जड़ों को हिला दिया। बीजेपी ने अनुभवी नेता को अपने पाले में किया और जीत का स्वाद चखा।
मुंबई। महाराष्ट्र में हुए निकाय चुनावों से एक बार फिर बीजेपी की चुनावी रणनीति उभरकर सामने आई है। कभी इस मामले में कांग्रेस को एक्सपर्ट कहा जाता था लेकिन अब बीजेपी लगभग हर चुनाव में वोटरों को रिझाने और अपना असरदार प्रदर्शन करने की लय बरकरार रखी है। खासकर उम्मीदवार उतारने को लेकर बीजेपी ने जो ट्रिक अपनाई वह लगातार कारगर साबित हुई है। बीजेपी की रणनीति का असर यह हुआ है कि महाराष्ट्र के 10 में से 8 महानगर पालिका चुनाव में बीजेपी नंबर वन पार्टी बनी है।

दूसरी पार्टियों में सेंध लगाकर चढ़ी जीत की सीढ़ी

मनसे की टीम को बीजेपी ने मिलाया

कभी जिसका विरोध किया उसी के दम पर जीता चुनाव

दो जगहों पर अपने दम पर जीती बीजेपी

बीजेपी के आने के पीछे तीन वजहें
अगर मुंबई की बात करें तो यहां बीजेपी ने 25 साल तक शिवसेना के साथ मिलकर शासन किया। यह ऐसी जगह है जहां बीजेपी हमेशा शासन करने की कोशिश में रही लेकिन शिवसेना की वजह से वह इस राह में सफल नहीं हो सकी थी। इस बार के चुनाव में बीजेपी को शिवसेना से अलग होते ही बेहतर मौका मिला जिसमें खुद को साबित किया जा सके। बीजेपी के लिए यह खेल चुनौती भरा था लेकिन चुनाव परिणामों ने सबको दंग कर दिया। बीजेपी को यहां 300 फीसदी की ग्रोथ मिली। इसके पीछे तीन वजहें भी हैं- 1: मुंबई के लोग शिवसेना की बचकानी राजनीति से ऊब चुके हैं। 2: मुंबई में उत्तर भारतीयों के साथ होने वाली ज्यादती से भी लोगों का शिवसेना से मोहभंग हो गया। 3: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस की खुद की छवि भी कारगर रही।

मुंबई में शिवसेना को 'बेनकाब' करने की कोशिश
बीजेपी ने बीते दो सालों में मुंबई काफी विकास कार्य किए। फडनवीस की छवि को चमकाते हुए बीएमसी में 40000 करोड़ के घोटाले का मुद्दा उठाया। शिवसेना पर लगे गंभीर आरोपों के बाद बीजेपी ही अगले विकल्प के तौर पर सामने आई। हालांकि बीजेपी खुद को ग्राउंड लेवल पूरी तरह मजबूत नहीं कर पाई है जबकि शिवसेना की जड़ें जमी हुई हैं। कांग्रेस और एनसीपी रफ्तार से काफी धीमी चल रही हैं ऐसे में मुकाबले से दोनों पार्टियां पहले ही बाहर थीं। बीजेपी की चुनावी रणनीति ठीक वैसी है जो कांग्रेस ने 80 के दशक में अपनाई थी। यानी लक्ष्य सिर्फ चुनाव जीतना हो।
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