पंजाब: राज्यसभा सांसद विक्रमजीत साहनी ने ब्याज दरों में वृद्धि पर चिंती व्यक्त की

विक्रमजीत सिंह साहनी, जो वाणिज्य की संसदीय सलाहकार समिति के सदस्य भी हैं, ने कहा कि इन ब्याज दरों में और वृद्धि का सीधा असर लंबी अवधि के कर्जदारों, विशेषकर घर के खरीदारों और एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ेगा।

राज्यसभा सांसद और संसदीय वित्त समिति के सदस्य विक्रमजीत सिंह साहनी

राज्यसभा सांसद और संसदीय वित्त समिति के सदस्य विक्रमजीत सिंह साहनी ने कहा है कि आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने नौ महीने में नीतिगत ब्याज दर, रेपो में छठी वृद्धि के लिए 8 फरवरी 2023 को वोट दी। जिसके साथ आरबीआई ने बैंकों के लिए अपने रेपो को 0.25 प्रतिशत अंक बढ़ाकर 6.5% कर दिया। साल भर में विभिन्न वृद्धि के परिणामस्वरूप, बैंक ब्याज दरें 7% से 9% तक बढ़ गई हैं।

विक्रमजीत सिंह साहनी, जो वाणिज्य की संसदीय सलाहकार समिति के सदस्य भी हैं, ने कहा कि इन ब्याज दरों में और वृद्धि का सीधा असर लंबी अवधि के कर्जदारों, विशेषकर घर के खरीदारों और एमएसएमई क्षेत्र पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान में मुद्रास्फीति उत्पादन और निवेश के सप्लाई में रुकावट के कारण है, न कि उच्च मांग के कारण है।
साहनी ने रेपो दरों में पिछली वृद्धि के बारे में बोलते हुए कहा कि आरबीआई पहले भी 5 बार यह वृद्धि कर चुका है व इस प्रकार उच्च ब्याज दरों के माध्यम से मौद्रिक नीति को कड़ा किया जाता है, जो आमतौर पर मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए होता है। लेकिन यह उम्मीद के अनुसार परिणाम नहीं दे सकता है, क्योंकि मौजूदा मुद्रास्फीति अत्यधिक मांग के कारण, नहीं बल्कि प्रमुख रूप से सप्लाई में रुकावट के कारण है।

साहनी ने कहा कि रुपया 82 रुपये प्रति डॉलर के मूल्यांकन के साथ अब तक के सबसे निचले स्तर पर है, जो पहले से ही अंतिम उपयोगकर्ताओं की आर्थिक समस्याओं को विशेष रूप से तेल और उर्वरक जैसी आयात होने वाली वस्तुओं के संबंध मे बढ़ा रहा है और फिर ऐसी परिस्थितियों में यह कदम विभिन्न वस्तुओं के लिए इनपुट कीमतों में वृद्धि के साथ आम लोगों पर बोझ और बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थ, ईंधन आदि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के 55 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं और इसकी गर्मी आम घरों तक जल्द पहुंचेगी।

साहनी ने यह भी कहा कि आरबीआई का 2023-24 के लिए जीडीपी का अनुमान 6.4 प्रतिशत है और वार्षिक औसत मुद्रास्फीति 5.3 प्रतिशत है, जिससे ना तो अर्थव्यवस्था को तपिश पहुंचेगी और न ही आरबीआई के अपने कानूनी मुद्रास्फीति जिम्मेदारी के पूरा होने की संभावना नहीं है। पहले कोविड और फिर यूक्रेन युद्ध जैसी भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण पिछले तीन वर्षों में कई सप्लाई संबन्धी रुकावटों ने ब्याज दरों और मुख्य मुद्रास्फीति के बीच की कड़ी को कमजोर कर दिया है। इसके कारण, वस्तुओं की मुद्रास्फीति सेवाओं की तुलना में कहीं अधिक अस्थिर है और समग्र कोर मुद्रास्फीति में वृद्धि का मुख्य कारण रही है।

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