ओडिशा सरकार की रणनीति हुई सफल, एक वर्ष में एनीमिया में17 प्रतिशत की आई कमी
ओडिशा सरकार ने राज्य में एनीमिया केसों में कमी लाने के लिए जो रणनीति अपनाई वो अब सफल होती नजर आ रही है। स्वास्थ्य रणनीति के अनुसार टारगेट किए गएउ लाभार्थियों को दो से तीन महीने तक का ट्रीटमेंट प्रदान किया गया इसके साथ ही उन्हें हीमोग्लोबिन लेबल की जांच के बाद उन्हें आहार विविधता के बारे में जागरूक किया गया।

सरकार की ये रणनीति अब सफल हुई है, पहले देश में सबसे अधिक एनीमिया वाले राज्यों में ओडिशा राज्य शामिल था था, ओडिशा ने पोषण की कमी के बोझ से निपटने में एक बड़ी छलांग लगाई है, जिसका नतीजा ये है कि राज्य में बीते एक साल में एनीमिया की कुल दर में 17.5 प्रतिशत की कमी आई है।
प्रदेश सरकार की राज्य में हाल ही में करवाई गई स्टडी के अनुसार विभिन्न आयु वर्ग के लोगों में एनीमिया का स्तर लगभग 46.7 प्रतिशत पाया गया है। 2019-21 में आयोजित पिछले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार यह 64.2 प्रतिशत था।
- 6-59 महीने के बच्चों में एनीमिया का स्तर 64.2 प्रतिशत से घटकर 38.3 प्रतिशत
- 10-19 वर्ष की किशोरियों में 65.5 प्रतिशत से घटकर 41.6 प्रतिशत
- प्रजनन आयु की महिलाओं में 64.3 प्रतिशत से घटकर 52.6 प्रतिशत
- गर्भवती महिलाओं में 61.8 प्रतिशत से 56.5 प्रतिशत
- स्तनपान कराने वाली माताओं में 67.1 प्रतिशत से 63.8 प्रतिशत
उपलब्धि
- एनीमिया स्तर - 64.2 प्रतिशत से घटकर 46.7 प्रतिशत हो गया
- बच्चे (6-59 माह)- 64.2 प्रतिशत से 38.3 प्रतिशत
- किशोर लड़कियां- 65.5 प्रतिशत से 41.6 प्रतिशत
- गर्भवती महिलाए- 61.8 प्रतिशत से 56.5 प्रतिशत
- स्तनपान कराने वाली माएं- 67.1 प्रतिशत से 63.8 प्रतिशत
एनीमिया केसों में सुधार के लिए किए गए ये प्रयास
टेस्ट, ट्रीटमेंट और टॉक (टी 3), एनीमिया के गैर-पोषण संबंधी कारणों को संबोधित करना, जागरूकता, परिवार नियोजन और सुरक्षित मातृत्व शामिल था।
डॉ. पाणिग्रही ने बताया कि राज्य में पांच वर्षीय योजना एनीमिया के स्तर को प्रति वर्ष कम से कम 10 प्रतिशत कम करने के लक्ष्य के साथ शुरू की गई थी। यह अत्यधिक उत्साहजनक है कि पहले वर्ष में ही स्तर में 17.5 प्रतिशत की कमी आयी है। यह हस्तक्षेप तब तक जारी रहेगा जब तक राज्य एनीमिया से मुक्त नहीं हो जाता।
रणनीति के अनुसार, लक्षित लाभार्थियों को दो से तीन महीने तक ट्रीटमेंट दिया जाता है और हीमोग्लोबिन स्तर की जांच के बाद आहार विविधता के बारे में जागरूक किया गया। कंडीशन में सुधार आने पर उन्हें प्रोफिलैक्सिस दृष्टिकोण के तहत रखा जाता था और यदि कोई सुधार नहीं देखा जाता था तो उन्हें बेहतर इलाज के लिए अस्पताल भेजा जाता था।












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