Jharkhand: बूढ़ा पहाड़ के इलाके में सजने लगी बाजार ग्रामीणों को मिला रोजगार
बूढ़ा पहाड़ के इलाके में सजने लगी बाजार ग्रामीणों को मिला रोजगार और छात्रों को स्कूल सुरक्षाबलों के सहयोग से मुख्यधारा में लौटने लगी जिंदगी मनीष उपाध्याय

झारखंड: बूढ़ा पहाड़ के इलाके में रहने वाले लोगों के लिए अब अच्छे दिन आने लगे हैं। सीआरपीएफ के जवानों के प्रयास से बूढ़ा पहाड़ के गांव तक पहुंचने के लिए सड़क बनने के साथ-साथ ग्रामीणों को रोजगार तथा शिक्षा के भी अवसर मिलने लगे हैं। इससे ग्रामीणों के मन में उत्साह दिख रहा है। ऐसे में पूरी तरह सुनसान रहने वाले गांव में भी अब ग्रामीणों की चहल पहल दिखने लगी है ।
सीआरपीएफ के जवानों और ग्रामीणों ने श्रमदान से बनाया सड़क
बूढ़ा पहाड़ के गांव तक पहुंचने के लिए ग्रामीण और सीआरपीएफ के जवान संयुक्त रूप से श्रमदान कर कच्ची सड़क का निर्माण कर रहे हैं। इसके लिए आवश्यक संसाधन की उपलब्धता सीआरपीएफ के द्वारा कराई जा रही है। वहीं ग्रामीण सीआरपीएफ जवानों के साथ कदम से कदम मिलाकर अपने गांव तक सड़क निर्माण करने में लगे हुए हैं। ग्रामीण महेंद्र यादव बताते हैं कि बूढ़ा पहाड़ पर बसे गांव में आज तक कोई वाहन नहीं पहुंच पाई थी। परंतु अब सीआरपीएफ के जवानों के उत्साहवर्धन और सहयोग से ग्रामीणों ने मिलकर कच्ची सड़क का निर्माण करा लिया है। बरसात के दिनों में तो गांव से निकलना भी मुश्किल हो जाता था।
गुलामों सी जिंदगी जी रहे थे बूढ़ा पहाड़ के गांव में बसे लोग
बूढ़ा पहाड़ का इलाका जो कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था। इस इलाके में रहने वाले लोगों के लिए कहा जाता है कि आजादी के 75 वर्ष बाद भी इन लोगों को गुलामों की तरह जिंदगी जीने की विवशता थी। कुछ दिन पूर्व तक यह इलाका सड़क, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित था। परंतु सुरक्षाबलों के आगमन के बाद इस इलाके में रहने वाले लोगों के जीवन में भी परिवर्तन आने लगी है।
गांव में ही मिलने लगा रोजगार
ग्रामीण बताते हैं कि अब इस इलाके की फिजाएं भी बदलने लगी है। नवाटोली गांव के घनश्याम यादव बताते हैं कि गांव में जब से सीआरपीएफ का कैंप बना है ।तब से गांव में सड़क के साथ-साथ रोजगार के साधन उपलब्ध हो गए हैं। ग्रामीणों को अब दूध बेचने के लिए कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती ,कैंप में ही दूध की बिक्री हो जाती है। वही कैंप बनने के बाद जरूरत के सामान की भी बिक्री गांव में बढ़ गई है। ऐसे में ग्रामीण अपने घर में छोटे-मोटे दुकान भी खोल दिए हैं। इस इलाके में न तो रोजगार के साधन थे और ना ही कोई कमाई का जरिया था। ग्रामीणों को अपने परिवार का पालन पोषण करने में ही मुश्किल होती थी। इसके बावजूद मजबूरी में ग्रामीणों को खुद भूखे रहकर नक्सलियों को खाना खिलाना पड़ता था। परंतु कैंप आने के बाद नक्सलियों का आना जाना भी पूरी तरह बंद हो गया है। गांव में रोजगार के साधन उपलब्ध होने से ग्रामीणों की जीवन में भी खुशहाली आने की संभावना बढ़ गई है।
वैकल्पिक व्यवस्था के तहत बनाया गया है स्कूल
बूढ़ा पहाड़ का इलाका तीसिया में सीआरपीएफ में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत स्कूल का निर्माण कराया है। एडबेस्टर से स्कूल का खाखा तैयार किया बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। 4 साल पहले स्कूल भवन ध्वस्त हो गया था। बच्चे पढ़ाई से वंचित थे। सीआरपीएफ ने कैंप के बगल में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत स्कूल बना दिया गया है। जहां पर बच्चे पढ़ाई के लिए जाते हैं।
रोजमर्रा के सामान के अलावा लेज और कुरकुरे भी मिल रहे
स्थानीय ग्रामीण कैंप खुलने के बाद दुकाने भी खोल दी है। कैंप के पास रोजमर्रा के सामान अलावे लेज कुरकुरे और बिस्किट भी बिकने लगा है। इसके अलावा किचन का बर्तन से दुकान सजने लगी है। साप्ताहिक बाजार भी लगने लगा है। कैंप के जवान भी सामानों की खरीदारी करते हैं।
बूढ़ा पहाड़ का विकास 100 करोड़ की विकास परियोजना तैयार की गई है। इसके विकास के लिए लातेहार के 11 गांव और गढ़वा के 11 गांव शामिल है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ का इलाका पड़ता है।
10 वर्षों से बूढ़ा पहाड़ पर माओवादी नक्सलियों का कब्जा रहा था।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बूढ़ा पहाड़ जाकर विकास करने का किया हैं घोषणा
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