गहलोत सरकार की हरित हाइड्रोजन नीति अहम, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होगा राजस्थान
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार की हरित हाइड्रोजन नीति का उद्देश्य केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि अन्य राज्यों में भी जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करने वाली है। इसके साथ ही इसके लिए जरिए जलवायु परिवर्तन को भी काफी हद तक रोकाजा सकेगा। सीएम गहलोत की सरकार के इस कदम को बेहद अहम माना जा रहा है।
राजस्थान सरकार ने इस नीति की मंजूरी न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश के लिए स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हरित हाइड्रोजन नीति के तहत जलवायु परिवर्तन ने होने वाले प्रभाव और जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से होने वाले प्रदूषण दोनों को कम किया जा सकता है।

गहलोत सरकार की नीति के तहत राज्य के भीतर हरित हाइड्रोजन के विकास और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध है। अपनी स्वच्छता और नवीकरणीयता के लिए प्रशंसित ग्रीन हाइड्रोजन में बिजली उत्पादन, परिवहन और औद्योगिक प्रक्रियाओं सहित विभिन्न अनुप्रयोगों में अपार संभावनाएं हैं।
हरित हाइड्रोजन नीति के लाभ
- ट्रांसमिशन और वितरण शुल्क पर 50% छूट: दस वर्षों की अवधि में, राज्य के ट्रांसमिशन नेटवर्क पर 500 किलोटन प्रति वर्ष (KTPA) नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने वाली कंपनियों को इस छूट का आनंद मिलेगा।
- अतिरिक्त और क्रॉस सब्सिडी सरचार्ज से 100% छूट: यह छूट बाहरी स्रोतों से नवीकरणीय ऊर्जा की खरीद तक फैली हुई है।
- भूमि आवंटन और अनुसंधान सुविधा निर्माण में प्राथमिकता के लिए 30% अनुदान: उपचारित या खारे पानी से हरित हाइड्रोजन उत्पादन के लिए समर्पित कंपनियां सुव्यवस्थित भूमि आवंटन के साथ ₹50 मिलियन तक का अनुदान सुरक्षित कर सकती हैं।
- पीक टाइम के दौरान बिजली निकासी पर प्रतिबंध: नीति इस बाधा को हटाकर ऊर्जा उपयोग में अधिक लचीलेपन की सुविधा प्रदान करती है।
- व्हीलिंग और ट्रांसमिशन शुल्क की पूर्ण प्रतिपूर्ति या छूट: इन वित्तीय प्रोत्साहनों से बिजली संयंत्रों को लाभ होगा।
- पावर प्लांट बैंकिंग शुल्क का रिफंड या छूट: कंपनियां सात से दस साल तक की अवधि के लिए इस विशेषाधिकार का आनंद ले सकती हैं।












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