नवरात्रि में क्यों रखना चाहिये उपवास

सनातन हिन्दू धर्म में हमारे ऋषियों व मनीषियों ने जो भी नियम व विधान निर्मित किये है, वह सिर्फ इसलिए कि जिससे हमारी शारीरिक व मानसिक स्थिति सुदृढ़ रह सकें और हम सभी अपनी जीवन यात्रा का भरपूर आनन्द ले सकें। समाज और धर्म का गहरा सम्बन्ध है, जिस कारण इन विधानों व परम्पराओं को धर्म से सम्बद्ध किया गया है ताकि इन्सान इन्हे मानने के लिए कटिबद्ध रहे।
मां दुर्गा जो भी शस्त्र धारण किये हुये है, उसका अपना प्रतीकात्मक अर्थ होता है। देवी-देवता हमारे अन्तःकरण में रहते है, वे हमारे स्वयं का प्रतिबिम्बन है। सुन्दर व वात्सल्यमयी देवी दुर्गा शेर की सवारी करती है। आखिर ऐसा क्यों? शेर शक्ति का प्रतीक है और स्त्री सहनशक्ति का प्रतीक है। मां दुर्गा इन दोनों के सामंजस्य का प्रतीकात्मक स्वरूप है। हमारे मनीषियों ने शब्दों की बजाय प्रतीक रूपों में ईश्वर को प्रस्तुत करना उचित समझा क्योंकि शब्द समय के अनुसार बदलते रहते है, किन्तु प्रतीक कभी बदला नहीं करते है।
नवरात्र वर्ष में दो बार होते है। प्रथम बार चैत्र में एंव दूसरी बार आश्विन मास में। चैत्र के नवरात्र को वासन्तिक एंव आश्विन के नवरात्र को शारदीय कहते है। नवरात्र आदि शक्ति की आराधना का पावन पर्व है। नवरात्र में दुर्गा शप्तशती के पाठ का विशेष महत्व है। दुर्गा शप्तशती का 1 पाठ करने से घर का उपद्रव शान्त होगा। 3 पाठ करने से भय से मुक्ति मिलेगी। 6 पाठ करने से राज्य से लाभ प्राप्त होगा। 11 पाठ करने से धन और पुत्र की प्राप्त होगी। 16 पाठ करने से अकाल मृत्यु नहीं होगी और 100 पाठ करने से सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिलती है।
संवत् 2069 एंव सन् 2012 के शारदीय नवरात्र 16 अक्टूबर से 23 अक्टूबर तक है।
कलश स्थापना का विशेष मुहूर्त- प्रातः 6:45 मि0 से 11:30 मि0 तक।












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